मृत्यु के पीछे छिपे हुए स्वार्थ
मौन सिसकियाँ हैं,
धुएँ में गुम आहटें,
कौन सुनता है।
अंतिम साँसों में,
स्वार्थ का जाल गहरा,
मनुष्य अंधा।
श्रद्धा के नीचे,
लालच की परछाईं,
छिपी मुस्कानें।
रुदन की छाया,
लाभ की गिनती होती,
भाव खो गए।
शव के संग चल,
बोली लगाता मानव,
कितना निर्दय।
आँसू भी झूठे,
हृदय में सौदा चलता,
संवेदना मर।
प्रार्थना नहीं,
मंचों पर अभिनय है,
मृत्यु तमाशा।
अंत का क्षण भी,
स्वार्थ से भरा लगता,
शांति कहाँ है।
— डॉ. अशोक, पटना
