संस्कृति
शहर से गाँव में आयी मोहिनी ने चौपाल पर लोकगीत, ढोलक की थाप पर थिरकते बच्चे, जवान, बूढ़े देख खिलखिला कर हँस पड़ी। उसके पैर भी थिरकने लगे। उसने दादी से कहा,”दादी! दुनिया अब बहुत आगे बढ़ चुकी है। इनका कोई स्थान नहीं है।”
दादी गले लगाते हुए बोली,”है बिटिया! सबके साथ मिलकर खुल कर हँसना और दुख-सुख बाँटना।”
“सच दादी! आज महीनों बाद जी खोलकर हँसी हूँ। ये परम्पराएँ ही हमारी साँसें हैं। “
— डाॅ अनीता पंडा ‘अन्वी’
