कहानी – अन्तिम अभिलाषा
चुटकी भर सिन्दूर की कल्पना मात्र से कभी- कभी किसी की विरान जिन्दगी में किस तरह खुशियों के रंग भर देता है और आंखों में कैसे कैसे सपने उग आते हैं, यह हमने मनमतिया में देखा था।
शुरू के जीवन में जैसा कि देखा जाता है। लोग खूब सपने बुनते हैं, सपने खाते हैं और सपने ओढ़ते- बिछाते हैं। मनमतिया के जीवन में भी कुछ इच्छाएँ, कुछ अभिलाषाएं थीं। और वह उन अभिलाषाओं के साथ एक भरा- पूरा जीवन जीना चाहती थी। लेकिन पति की अकाल मृत्य से उनकी दुनिया- जहान में जो तूफ़ान उठा, उस तूफान ने उसके जीवन को ही बिखेर कर रख दिया था।
साल भर पहले जब वह पति की जगह काम पर आई थी और आफिस में पहला कदम रखा था। उसका डरा हुआ तब का हिरण सा चेहरा आज भी मुझे याद है।
पांच फीट की मनमतिया तीस में ही तीरपन की लग रही थी। उम्र और देह में कोई ताल- मेल नहीं। शरीर में मांस नहीं और आँखों में तेज नहीं। हर वक्त उदासीपन ओढ़े रहती। जैसे गहरी कोई झील हो। और खामोशी उसका साथी।
कम बातें करना और खुद को साड़ी से लपेटकर रखना, उसकी सादगी प्रगट कराती थी। चलती तो पैरों की आवाज की जगह उसकी सांसे सुनाई देती – ऐसी थी मनमतिया।
मनमतिया को रेलवे साइड़ींग में कंपनी आवास मिला हुआ था। जहां वह बारह बर्षीये बेटा महेश और साढ़े चौदह साल की बेटी माधवी के साथ रहती थी। उस कॉलोनी में सात ब्लॉक थे और सातो”डबल डेकर”और लोगों की मिजाज की बात करें तो उस कॉलोनी में एक छोटा भारत बसता था। किसी ब्लॉक में”उपी”वालों का कब्जा, तो किसी में बिहारियों का तो किसी- किसी में झारखंड, उडीसा और छत्तीसगढियों का कब्जा था। सुबह शाम, पुरूष महुआ पीकर लड़ते झगड़ते और मां- बहनों को ऐसी- तैसी करते रहते थे। वहीं औरतें भी किसी से कम नहीं थीं। कभी-कभार नल के सामने ही पानी को लेकर”पानीपत”का मैदान बना डालती थीं।
इन सबसे दूर छत्तीसगढ की मनमतिया की कुछ अपनी ही चिंता थी। वह जिस ब्लॉक के क्वार्टर नम्बर सात में रहती थी। वह पूरा ब्लॉक ही ढहने जा रहा था। यह बात ब्लॉक का मुआयना करने आए सिविल इंजीनियर ने एक दिन साफ तौर पर कह दिया था”जितनी जल्दी हो सके, यह ब्लॉक खाली कर, कोई सुरक्षित जगह चले जाएं सब, अब यह ब्लॉक सुरक्षित नहीं है। कभी भी, कोई भी घटना घट सकती है।”
तबसे मनमतिया का मन बहुत अशांत था। और इस समस्या का फिलहाल समाधान उसे नज़र नहीं आ रहा था। नयी नौकरी, नयी जगह और नये लोग। किससे कहे अपनी मन की पीड़ा। कौन सुधी ले उसकी। यह कोई छोटी- मोटी समस्या तो थी नहीं – बड़ी थी, मनमतिया से भी बड़ी। इसके बावजूद वह समय पर आफिस पहुंच जाती और अपने काम पर लग जाती थी। समय के साथ मनमतिया ऑफिस बाबुओं को पहचानने लगी थी और उनकी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बातों को भी समझने लगी थी। कुछ ही दिन में इतना समझदार हो चुकी थी कि किस आवाज में कितना पानी की प्यास है और किसमे कितना जिस्म की भूख। आवाज से ही वह असली और नकली का मर्म भी धीरे- धीरे बूझने लगी थी। कौन बाबू कितना महत्वपूर्ण है उसके लिए, यह महत्व नहीं रखता था, बल्कि कौन कितना सही है, यह महत्वपूर्ण था उसके लिए और वह इसी की पक्षधर थी। आफिस कार्य संस्कृति को एक औरत की नजरिए से उसने देखना शुरू दिया था। अपने काम और काबलियत के दम पर वह दबंग होते जा रही थी- कहना गलत न होगा।
आवास से आफिस और आफिस से सीधे आवास। यह उसकी दिनचर्या में शामिल हो चुका था। कभी उसे भीड़ का हिस्सा बनते नहीं देखा। भीड़ उसे भाती नहीं और भाषणों से उसे घोर नफ़रत थी। हाँलाकि बहुत कम समय में ही अपने काम और स्वभाव से वह बहुतों को अच्छी लगने लगी थी। लेकिन कुछ नाराज भी चल रहे थे। वजह विचित्र थी। मनमतिया जिस ट्रांसपोर्ट रोड़ से पैदल हर दिन काम पर आना- जाना करती थी, उसी रास्ते से ऑफिस के कुछ बाबू लोग भी बाइक से आना- जाना करते थे। परन्तु लिफ्ट के नाम पर आज तक उसने किसी की बाइक पर बैठने की ऊदारता नहीं दिखाई थी “नहीं, आप जाइए- मै पैदल ही ठीक हूँ।” उसके ऐसे जबाव से बहुतों का मन आहत थे। वहीं आंख बंद कर किसी भी सूरत में किसी पर भरोसा करने को तैयार नहीं थी- मनमतिया!
ऑफिस में भी कार्य के दौरान उसका अलग ही रूप देखा जाता था। बातें कम करना, जरूरत से ज्यादा किसी के पास बैठना नहीं। कोलिंग बेल बजते ही हाज़िर हो जाना, आवाज दे कोई तो उधर दौड़ जाना। इस मामले में वह ऑफिस का रोबोट थी। एक और खास बात, आफिस की कुटनी अन्य औरतों से दूर रहना उसे अच्छा लगता था।
ऑफिस बहेलियों के बीच काम करते हुए मनमतिया की आंखें हिरणी की तरह हमेशा चंचल और देह- कान से चौंकना रहते।
सुधीर बाबू का मतलब ही था ऑफिस समस्याओं का समाधान केंद्र! उसी समाधान केंद्र में एक दिन मनमतिया ने कदम रखा था।
नौकरी में मनमतिया का अभी अभी तीन सौ पैंसठ दिन पूरा हुआ ही था कि एक दिन ऑफिस पियून प्रभुराम ने यह कह कर सबको चौंका दिया कि मनमतिया आज मधुकर बाबू की बाइक पर बैठकर काम पर आई है। यह एक ऐसी खबर थी जैसे कोई नीच, कोई बड़ा बगुला भगत किसी मंदिर का पुजारी बनने में सफल हो गया हो। इस खबर से ऑफिस में कार्यरत लम्पट बाबूओं के बीच एक खलबली सी मच गई थी। कुछ पल के लिए सुधीर बाबू भी सोच में पड़ गए थे। मधुकर बाबू के साथ मनमतिया का आना शायद उन्हें भी अच्छा न लगा हो। हाँलाकि प्रभुराम की बातों पर बहुतों को यकीन नहीं हुआ था। कारण भी था। मनमतिया अपने मन की मलिका और कहां पियक्कड़ मधुकर बाबू। दोनों का मेल कैसा? मुझे लगा मनमतिया जरूर किसी गहरी दबाव में है। मधुकर बाबू के साथ बाइक पर आने के पीछे जरूर कोई गहरी राज है। मैने मामला सीधे समाधान केंद्र में पहुंचा दिया। सुधीर बाबू ने बिना देर किए इस तथाकथित”लिफ्ट कांड़”के पीछे अपने दो जासूस लगा दिए थे। और प्राइवेट जासूस की तरह लिफ्ट कांड़ का उद्भेदन भी जल्द हो गया। कहानी दिलचस्प थी। आम तौर पर लोग इसे”कठुआया हुआ मिजाज”कहते हैं। जानकार लोग मधुकर बाबू को इसी नजरिए से देखते थे।
मधुकर बाबू पेंशन विभाग का इंचार्ज था। लेकिन उसको लेकर लोगों का टेंशन अक्सर बढ़ जाता था। कहते है न, यदि पड़ोसी खुलेआम पेशाब करने लगे, तो पड़ोसन की परेशानी बढ़ जाती है। पेंशन कामों को लेकर मधुकर बाबू पूरी तरह नंगे हो चुका था। पेंशन सेटलमेंट को लेकर सुधीर बाबू के समाधान केंद्र पर काफी दबाव बढ़ा हुआ था। मजदूर और पेंशनधारियों के दबाव से सुधीर बाबू का भी टेंशन बढ़ा हुआ था”आप यहीं है, फिर भी अंधेर मचा हुआ है। इसका कुछ करते क्यों नहीं?”मजदूर सुधीर बाबू को ललकारते।
“इसका बहुत जल्द उपाय होगा।”सुधीर बाबू कहते।
ऐसे ही समय में मधुकर बाबू की बाइक पर मनमतिया का आना- ठेकेदार- आफिसर की दोस्ती हो जाने जैसी बात थी।
मधुकर बाबू भी अपनी”पैसन- प्लस”बाइक से उसी ट्रांसपोर्ट रास्ते से आना-जाना करता था, और उसी राह से मनमतिया भी आती जाती थी। लेकिन मनमतिया कभी पलट कर भी मधुर बाबू की तरफ नहीं देखती थी। लोक- लाज छोड़कर मधुकर बाबू ने कई बार मनमतिया को साथ चलने को कह चुका था। और मनमतिया का रटे- रटाया जवाब-“नहीं, आप जाइए, मैं पैदल ही ठीक हूँ।”
मनमतिया का यह जवाब मधुर बाबू ने दिल पे ले लिया।उसे लगा, मनमतिया ने उसकी बेईज्जती की है। मगरूर मनमतिया का गरूर उसे तोड़ना ही होगा, तभी ऑफिस में खोयी धाक वह वापस पा सकता है। तभी उसका फिर से डंका बज सकता है। उसी दिन से वह एक घाघ शिकारी की तरह”बेमौसम बरसात”के इंतजार में जैसे गुफा के भीतर घात लगाकर बैठा था।
मनमतिया ने कभी यह नहीं सोचा था कि एक दिन पति की जगह उसे नौकरी करनी पड़गी। लेकिन आदमी को किस्मत कब किस मोड़ पर लाकर पटकेगी, यह किसे पता होता है! मनमतिया को भी कहां पता था। अभी तो वह जीवन और यौवन के रंग में डूबी हुई थी। तभी वह हादसा हुआ था। वह एक जुआरी रात थी। जुए में जीते हुए पैसे लेकर उसका पति कैलाश बीपी अपने क्वार्टर की ओर बढ़ा था कि हारे हुए जुआरियों ने अकस्मात उस पर हमला कर दिए, पैसे छीन लिए और मार कर उसे चौक वाले कुंए में ढ़केल दिए थे। तब मनमतिया मात्र बत्तीस साल की थी।
ऐसे में एक दलाल ने उसकी नौकरी लगवाने और पेंशन सेटलमेंट का एक मुस्त जिम्मा लिया था। नौकरी तो मनमतिया को मिल गई थी। पर पारिवारिक पेंशन सेटलमेंट का पेपर आगे नहीं बढ़ा था। जबकि पेंशन सेटलमेंट कराने का भी पूरा- पूरा पैसा मधुकर बाबू पहले ही पकड लिया था। परन्तु सेटलमेंट का कागज़ात”आज कल, आज कल”कर ठेलाता जा रहा था। और दलाल मधुकर बाबू के इस”आज कल”को समझ नहीं पा रहा था। और पेपर भी आगे बढ़ नहीं पा रहा था। तभी एक दिन मधुकर बाबू के मुंह से निकला था वो मलाल वाली बात”तुम उसका पेपर भेजने की बात करते हो? वह हमारे ऑफिस में ही काम करती है और हमें ही भाव नहीं देती है, इतना ही नहीं, मैं भी उसी रास्ते से आता- जाता हूं। कई दफा उसे साथ चलने को कहा। लेकिन वह कभी मुझे महत्व ही नहीं देती है।”
दलाल सुन कर दंग रह गया! अब इसके लिए इसे कौन सा घूस दिया जाए ?
और अगले ही दिन मनमतिया मधुकर बाबू की बाइक पर बैठकर ऑफिस आ गई। उसी दिन मधुकर बाबू ने मनमतीया का पेंशन सेटलमेंट का पेपर हेडक्वार्टर भेज दिया। मनमतिया खुश! मधुकर बाबू भी खुश!
इसी बीच मनमतिया ने दो दिन का आकस्मिक अवकाश ले ली और घर बैठी रही।
मधुकर बाबू ने तो जैसे किला फतह कर लिया था। वह भीतर से बेहद खुश और उत्साहित नज़र आ रहा था। चालीस का मधुकर बाबू खुद को आफिस का इमरान हाशमी समझने लगा था। लेकिन मनमतिया कोई मलिका सरारवत नहीं थी। वह मन्दिरा बेदी भी नहीं थी। वह तो”एक चादर मैली सी”की हेमा थी। और मधुकर बाबू जिस जीत पर इतना खुश हो रहा था, दरअसल वह मनमतिया का”काम पास- टाइम पास”से ज्यादा कुछ भी नहीं था। इसकी झलक भी जल्द देखने को मिल गई। दो दिन बाद मनमतिया से”नहीं, आप जाइए”मधुकर बाबू को टनक जबाव मिल गया था। और वह ठिसुआ- कठुआया सा उसे देखता रह गया था।
इधर कुछ दिनों से मनमतिया फिर से परेशान नज़र आने लगी थी। पता चला ठीक-ठाक क्वार्टर को लेकर तो वह पहले से ही परेशान थी। कारण जिस ब्लॉक में वह रहती थी, उस ब्लॉक के अधिकांश क्वार्टरों की हालत दाद- खाज, खुजली वाले बीमार कुतों की तरह हो चुकी थी। किसी का छज्जा गिर रहा था, तो किसी की छत से बरसात में”टिप! टिप! पानी चू रहा था। ऊपर से”क्वार्टर रहने लायक नहीं रह गए हैं।”इंजीनियर की कही बातों ने सबको डरा रखा था। सबकी नींद उडी हुई थीं।
मतलब कि वह पूरा ब्लॉक ही ढहने जा रहा था। और मनमतिया अपने दोनों बच्चों के साथ दफन होने से बचना चाहती थी। फिकर को ओढ़े मनमतिया एक सुरक्षित क्वार्टर की अभिलाषा लिए काम पर आती- जाती। लेकिन मन की बात किससे कहे, यही समझ नहीं पाती थी। उसकी अगली परेशानी”काम और जगह”को लेकर भी थी। ऑफिस में वह जिन लोगों के साथ काम कर रही थी। वहां से उसका मोह भंग हो चुका था। काम के साथ- साथ हर दिन कुछ बातें और गिनी- चुनी कुछ हरकतों के साथ समझौता करने को कहा जा रहा था। जो उसे मंजूर नहीं थीं। पेपरवेट वाली इस दबाव से भी वह मुक्त होने की फिराक में थी। दिली तमन्ना थी, कोई उसे इन दबावों से मुक्त करा दे- आजादी दिला दे! उसकी अभिलाषाएं बढ़ती ही जा रही थीं।
क्वार्टर और काम वाली जगह को लेकर वह बेहद तनाव में थी। उसकी हर दिक्कतों का अंश टुकडों- टुकड़ों में सुधीर बाबू के समाधान केंद्र में पहुंच रही थी। परन्तु मनमतिया का समाधान केंद्र में आना अभी बाकी था।
बादलों से घिरा उस दिन का दोपहर समाधान केंद्र के लिए बेहद खास दिन बन कर आया था। मनमतिया ने पहली बार समाधान केंद्र में कदम रखा था। वही पहनापा, वही सतर्कता और वही हिरणी सी चौंकना रूप! उसने सुधीर बाबू को बडी कोमल नजरों से देखा और सुधीर बाबू ने उसे खुली आंखों से निहारा था। फिर पहले पहल किसने की, किस तरह प्रणाम- पाती हुई और किस भाव से टेबुल के सामने मनमतिया कुर्सी पर बैठ गई। उसकी कोई जुबान नहीं थी। वह अपनी आप बीती सुना रही थी और सुधीर बाबू उसे उसकी धडकनों की आवाज के रूप में सुन रहे थे। मनमतिया की एक एक बात सुधीर बाबू को मन – मन का भार सा प्रतीत हो रहा था। और अंत में मनमतीया के मुंह से एक आह निकल गई”क्वार्टर को लेकर साल भर से परेशान हूँ। छत का झडते प्लास्टर और चूते छत देख छाती फटती है। समझ में नहीं आता कहां जाऊं, किसे कहूं। बड़ी उम्मीद और भरोसा लिए आयी हूँआपके पास।”
एक पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छाई रही। मनमतिया का मन मृग की भाँति उछल कुद मचाता रहा। वह अपनी परेशानियों से निजात चाहती थी। समाधान केंद्र से समाधान की गुहार लगाने आई थी। परन्तु उनकी उन समस्याओं का समाधान केंद्र में तत्काल कोई हल नहीं था। लेकिन उसे निराश होने भी नहीं दिया गया। समाधान केंद्र को किसी सिद्धपीठ की तरह बखान करते हुए सुधीर बाबू ने कहा था”आपकी समस्या अब हमारी समस्या है। आपको हर तरह की मदद मिलेगी।”
मनमतीया थोडी आश्वस्त दिखी। जीवन का लय बिगड़ चुके चेहरे का तनाव तनिक कम हुआ दिखा। लगे हाथ सुधीर बाबू ने कहा”देखो मनमतिया, तुम्हरी यह क्वार्टर वाली जो समस्या है, जीवन- मरन की तरह थोड़ी जटिल है। थोड़ा वक्त लगेगा। रही दूसरी बात, काम और जगह की, जिसे तुमने अभी- अभी सिरदर्द कहा है। उसका समाधान पहले हो जाएगा। तुम इसकी चिंता छोड़ दो”मैं हूँ न”
इसके साथ ही दोनों ने अपनी- अपनी किस्मत को धन्यवाद दिया। एक दूसरे को मिलाने के लिए।
सप्ताह दिन बाद ही मनमतिया बतौर महिला पियून सुधीर बाबू की ऑफिस में योगदान देने चली आई। इसको लेकर पूर्व विभाग वाले दो दिन तक कार्मिक अधिकारी के आफिस के बाहर हल्ला- हंगामा करते रहे। पर कार्मिक अधिकारी ने किसी की एक नहीं सुनी और सुधीर बाबू के आगे किसी को कुखने की हिम्मत नहीं थी। सुधीर बाबू कोलियरी का सबसे बडे यूनियन नेता होने का मनमतिया को लाभ मिला। जो लोग अभी तक सुधीर बाबू को”आलराउंडर”कहते थकते नहीं थे, अब वही लोग उन्हें”बवंडर”नेता कहने लगे थे। किसी को कहीं भी उड़ा ले जा सकते थे। वहीं मनमतिया बेहद खुश थी। मन गदगद था उसका। सुधीर बाबू के ऑफिस का हिस्सा बन जाने और उसकी पहली अभिलाषा पूरी होते ही उसकी सूजी हुई आंखें यकायक चमक उठी और चेहरे का तनाव एक बारगी से गायब हो चुका था।
अपने काम के प्रति मनमतिया का समर्पण भाव देख सुधीर बाबू को भी अच्छा लगा। काम और जगह वाली टेंशन से मनमतिया आजाद हो चुकी थी। धीरे- धीरे उसकी सुखी हड्डियों में मांस चढ़ना शुरू हो चुका था। चेहरे पर बदलाव भी साफ नज़र आने लगा था। यदपि मनमतिया सुधीर बाबू के ऑफिस में जरूर काम करने लगी थी तथा बेझिझक उनसे बातें भी करने लगी थी। फिर भी मनमतीया से जुड़ी बहुत सी बातें सुधीर बाबू दूसरों से पूछते- पता करते थे। ऐसी भी नहीं थी कि दोनों के बीच सीधी तौर पर बातें नहीं होती थी। खूब होती थी। लेकिन उस वक्त विषय और बातचीत का टोन बदला- बदला होता था। हर दिन का विषय भी उन दोनों का दिन की तरह अलग अलग होता। बातें करते वक्त दोनों एक दूसरे का चेहरा देखा करते और बारी- बारी से शर्माने का नाटक भी करते। इसी बीच सुधीर बाबू उनसे पूछ लेता -“खाने में क्या- क्या खाती हो? भात खाना ज्यादा पसंद है या रोटी?”
मनमतिया का जवाब उतना ही छोटा होता-“हम छतीसगढ़ी लोग भात खाना ज्यादा पसंद करते हैं। हमारे घरों में रोटी कम ही पकती हैं।”
फिर दोनों बातों- बातों में शादी-ब्याह से शुरू होते और बिस्तर तक घूस जाते। और लगे हाथ बच्चे गिनने बैठ जाते, तब सुधीर बाबू लगे हाथ यह भी पूछ डालते -“अभी तुम्हारे कितने बच्चे हैं?”
“पूर्व- पश्चिम! कुल दो।”
“कुछ ज़्यादा स्पीड़ नहीं हो गया?”
“मैं तो पटरी थी, – स्पीड़ ब्रेकर लगाना तो उसका काम था।”मनमतिया का जवाब उतना ही लाजवाब होता था।
कुछ ही दिनों में दोनों की हालत ऐसी हो गई थी कि दोनों जब तक एक दूसरे से बात नहीं कर लेते, दोपहर का दोनों के गले नास्ता नहीं उतरता था।
कभी- कभी दोनों यह भूल जाते कि यह ऑफिस है और यहां कोई भी, कभी भी आ- जा सकते हैं। यह ख्याल आते ही दोनों अपना- अपना कान दीवार के साथ सटा देते। अगले ही पल दोनों जोरों से हंस पड़ते तो हंसते ही चले जाते थे। तब उनकी हंसी में जीवन के कई रंग घुल-मिल जाते और वह रंगमय से रहस्यमय में बदल जाते थे।
मनमतिया के इस रहस्यमय बदलाव उसकी बेटी को रास नहीं आ रही थी। वह डर रही थी कि उनकी मां भी कहीं कजरी की मां की तरह अपने नये पति के साथ भाग न जाए। यह डर ही था कि एक दिन उसकी बेटी माधवी ऑफिस देखने के बहाने आई और सुधीर बाबू की उम्र और चेहरे को सूंघ कर चली गई।
दूसरे दिन ऑफिस आकर मनमतिया ने सुधीर बाबू को बताया”ऑफिस से लौटकर शाम को बेटी ने मुझसे पूछा”मां, उनकी उम्र क्या होगी?”
“मुझसे कुछ बड़े ही होंगे, तुमने देखा नहीं?”मैने कहा था
“कितने बड़े होंगे?”उसने मुझसे अगला सवाल किया।
“फीता- गज लेकर यह तो कभी नापा नहीं, पर तुम्हारे बाप की उम्र के होंगे।”
“कभी बाप तो नहीं बनेगा ?”
“चुप शैतान कहीं की, जो मन में आये बक देती है।”मैने उसे जोर से डांटा था।
उस दिन वे दोनों उम्र में ही उलझे रहे और अपनी ही नजरिए से उम्र की नाप- जोख दोनों करते रहे। उस दिन के बाद वह ऑफिस दोनों के लिए घर की तरह लगने लगा। जहां दोपहर को बैठ विविध भारती के गानों की तरह दोनों एक दूसरे की धड़कने सुनने लगे थे।
मनमतिया जैसी औरतें सुधीर बाबू को हमेशा लुभाती रही थी। यह उनके भीतर का लेखकपना ही था जो मनमतिया के भीतर की जिन्दगी को झांकने की कोशिश कर रहा था। मनमतिया की सादगी और बनावटी रहित जीवन सुधीर बाबू को बहुत रास आ रही थी। जो दिल में, वही जुबान पर और वही देह पर भी। सरसराता उसका बदन सुधीर बाबू को मदहोश किए रहता था। और मनमतियावह तो सुधीर बाबू के साथ काम करने से ही गदगद थी। दिल उसका बाग- बाग कर रहा था।
दोनों को साथ काम करते हुए छह माह से ऊपर हो चला था। इस बीच दोनों ने जी भर कर एक दूसरे की जांच-परख की। चीं- चीं करने वालेबच्चे तो थे नहीं। दोनों छिल- छिल, कूतर- कुतर कर खाने वालों में से थे।
इस बीच दोनों को लेकर ऑफिस में अफवाहें भी गरम थीं। पर कौन क्या कह रहे, कौन क्या बक रहे हैं, दोनों ने कान देना छोड़ दिए थे। कुछ दिन ऑफिस में खुसुर-पुसुर जरूर हुई। उस पर भी दोनों बहरे बने रहे। सुधीर बाबू की सान्निध्य पाकर मनमतिया में साहस काफी बढ़ गया था। दोस्ती का रंग उसकी देह और दिमाग दोनों पर चढ़ना शुरू हो गया था। समझदार लोग सोच-विचार कर ही उससे कुछ कहते। उनसे उल्टी- सीधी बात करने वालों को पता था”कुछ”का कहां पूछ होगा। खुद मनमतिया भी अब मुँहतोड़ जवाब देने को हमेशा जैसे तैयार रहती थी।
एक दिन छुटी के वक्त स्टोर बाबू तुकाराम ने मज़ाक से कह दिया”क्यों, खेला हो गया?”
तुकाराम- संत तुकाराम नहीं था। वह भी एक छत्तीसगढ़ी पियक्कड़ था। और मनमतिया से जलता था। मनमतिया के मुँह में जवाब भरा हुआ था”हां, मेरा खेला तो हो गया। अब जाती हूँ- डेरा, तेरी पीठ पीछे तेरी मोगी क्वार्टर में। जो खेला खेलती है- उसे देखने।”
फिर दूबारा मनमतिया से मुँह लगाने की हिम्मत तुकाराम में नहीं हुई।
मनमतिया सुधीर बाबू के पीछे खींचे चली आ रही थी। यह कहना गलत न होगा और यह सुधीर बाबू को हैरान करने वाली बात थी। एक दिन उसने सुधीर बाबू से कहा -“अब रात को आप बहुत याद आने लगे है।”
“क्यों भला?”सुधीर बाबू ने चौंक कर पूछे थे।
“क्वार्टर को लेकर मन में एक घबराहट सी होती है। रात भर ठीक से सो नहीं पाती। क्या पता, कौन सी रात हम सब के लिए आखरी रात हो जाए। क्या आप हमें उस क्वार्टर में दफन होते देखना चाहेंगे?”
मनमतिया को पता था। सुधीर बाबू ऐसा कभी नहीं चाहेगा। उस दिन मनमतिया पर प्रेम की चादर ओढ़ाते हुए सुधीर बाबू ने कहा था -“अब तुम क्वार्टर की चिंता मुझ पर छोड़ दो। बहुत जल्द इसका भी समाधान निकाल लूँगा।”
कहने को सुधीर बाबू ने मनमतिया से यह बात तो कह दी थी। लेकिन उनको पता था रेलवे साइड़ींग कॉलोनी में ऐसा एक भी क्वार्टर खाली नहीं था- जो रहने लायक हो। जो खाली था भी, उस पर अवैध कब्जा था। ऐसे में उस जर्जर क्वार्टर से मनमतिया को निकाल कर किसी अच्छे क्वार्टर में सिफ्ट कराना सुधीर बाबू के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन मनमतिया को चिंता की मझधार से निकालना ही होगा- यह सुधीर का दिल कह रहा था।
तभी एक दिन पूरी दबंगता के साथ”यूनियन”के नाम पर कब्जा किए दो में से एक क्वार्टर में मनमतिया को उन्होंने सिफ्ट करा दिया। कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किए।
“हमारी यूनियन”की अब यह सदस्य बन चुकी है।”कह सबको शांत किए।
उधर मनमतिया अभिभूत! इस उपकार पर वह एहसानों की माला पहनाने पर तुल गई। सुधीर उनसे कहना चाहा कि उन्होंने उस पर कोई एहसान- उहसान नहीं किया है, बस गिरती छत के नीचे एक मजबूत खम्भा खड़ी कर दी है। ताकि तुम लोग सुरक्षित रह सको। लेकिन एक अच्छे क्वार्टर मिल जाने की खुशी मनमतिया के चेहरे पर मोर की तरह नाच रही थी। अपने दिल के उदगार को वह किसी हाल रोक नहीं पा रही थी। एक दिन”आप मुझे कितना अपना समझते है, यह आप जाने, लेकिन मैं आपको अपना मान चुकी हूँ। पति भी होता तो इतनी ख़ुशी कभी नहीं दे पाता।”नि: संकोच कह डाली थी। उसके चेहरे से भावुकता टपक रही थी।
मनमतिया की इस स्वीकारोक्ति से सुधीर बाबू बुरी तरह उलझ गए थे। मनमतिया से लगाव और भावनात्मक संबंध से उनकी प्रतिष्ठा में दाग लगने की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता था। विरोधी यूनियन वाले ऐसे मौक़े की ताक में तो रहते ही हैं। खुद के यूनियन वाले भी उनकी यह”राउड़ी”रूप से मतभेद रखते थे। इधर मनमतिया को लेकर भी कुछ रोचकपूर्ण बातें सुनने को मिल रही थी। उनमे सबसे चौंकाने वाली बात थी। उसकी मांग में कभी”सिंदुर”का नहीं भरा जाना। यह जितनी रोचक बात थी। उतना ही बड़ा यक्षप्रश्न भी था कि मनमतिया ने कभी सिंदूर पहनी भी थी अथवा शूरू से ही उसकी मांग सूनी रही है? इस पर जो बात सामने आई उसने सुधीर बाबू को हैरत में डाल दिया। मनमतिया कभी सुहागन बनी ही नहीं। उसकी मांग कभी भरी ही नहीं गई। एक सिंदूरवान औरत की चाहत उसकी कभी पूरी हुई ही नहीं। एक जवान औरत की सूनी मांग उसके समूची अस्तित्व को थरथरा दे रहा था।
साल भर से सुधीर बाबू के साथ काम करने वाली मनमतिया ने एक दिन कहा”दस साल की जिन्दगी में उसके मर्द ने कभी सिंदूर की डिब्बी लाकर नहीं दी, मर्द कभी तो उसकी मांग भर दे, उसे एक पूर्ण औरत बना दे, अपनी इच्छाएँ दबाए रखीं।”
मनमतिया सुधीर बाबू को यह भी बतलाना चाहती थी कि किस तरह उसके पति के खानदान में शादी के दिन दुल्हन की मांग में सिंदूर भरने की जगह पति का चरण धूल माथे पर लगाने का रिवाज है। “कुछ दिन और बर्दास्त करो। बाद में मांग भर लेना” एक दिन पति ने कहा था।
लेकिन वह कुछ दिन मनमतिया के जीवन में फिर कभी नहीं आया।
मनमतिया के इस सिंदूर प्रकरण ने सुधीर बाबू को सकते में डाल दिया था। वह इस औरत की सादगी से काफी प्रभावित हो चुके थे- कहिए तो कुछ कुछ आकर्षित भी हो चुके थे। लेकिन अब घोर दुविधा में पड़ गए थे। ऐसे में रीता बाई की कही कुछ बातें बार-बार उन्हें सोचने पर विवश कर रही थी”हम जैसी भगायी औरतों को बहुत कम को ही सिंदूर पहनने का सौभाग्य प्राप्त होता है!”
सुधीर बाबू को पता था। रीता बाई- बिन-ब्याही रांड़ थी।
लेकिन उसके हक में यही रांड़पना काम आ गया था। मिलू बीपी की ही पत्नी है ब्लॉक से निर्गत”सदस्यता प्रमाण पत्र”के आधार पर एक दलाल ने उसे नौकरी दिलवा दी थी। तो क्या मनमतिया भी बिनब्याही विधवा है और कुंवारी ही दो- दो बच्चे की मां बन गयी? एक सच यह भी था, मनमतिया को भी ब्लॉक से निर्गत सदस्यता प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी मिली थी। न कि”एज पर सर्विस रिकार्ड”
सुधीर बाबू ने ठान लिए थे कि मनमतीया को उसके कुछ सवालों के जवाब देने ही पड़ेंगे – वह कुंवारी मां है या ब्याही?”दिन का चुनाव भी कर लिए थे”गांधी जयंती”
आमतौर पर इस दिवस को कोलियरी ऑफिस बंद ही रहता हैं। लेकिन सुधीर बाबू ने पहली बार अपने साथ मनमतिया का भी”पीएच”ग्रांट करवाए थे”पेड़ होली डेज!”
अपने जीवन में और नौकरी में भी पहली बार राजेश खन्ना फेम ड्रेस”कुर्ता- पाजामा”पहन ऑफिस पहुंचे थे सुधीर बाबू। जिसने देखा उसी ने”वाह, क्या बात है”कह उन्हें चने की झाड़ में चढा दिए। मनमतिया भी समय पर ऑफिस पहुंच गई थी।
दोपहर को दोनों”समाधान केंद्र”में आमने- सामने बैठे थे, एक दूसरे को निहारते हुए। समय धीरे धीरे सरक रहा था। दोनो खामोश थे। लेकिन दोनों की धड़कने बेकाबू थीं। पहल मनमतिया ने कि”आप तो आज दूल्हे जैसे लग रहे है!”
“अच्छा! बहुत दिनों से घर में बेकार पडा हुआ था। आज पहन लिया।”जवाब में सुधीर बाबू ने कहा था।
“सचमुच में अच्छे लग रहे हो।”
सुधीर बाबू चुप रहा। तभी अकस्मात सुधीर बाबू का मुंह खुला था -“मनमतिया, तुमको याद है, काम वाली जगह और क्वार्टर बदल जाने के बाद मैने तुमसे कहा था”अब तुम्हारी कौन सी अभिलाषा”बाकी है? तब तुमने कहा था कि”वक्त आने पर बताऊंगी।”आज मेरे मन में एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हो गया है कि”तुम शादी-ब्याह वाली विधवा हो या कुंवारी विधवा?”
जवाब मनमतिया के ब्लॉज के भीतर से एक”डिब्बी”के रूप में बाहर निकला। उसने उसे सुधीर बाबू की तरफ बढ़ा दी। सुधीर बाबू ने हैरत भरी नजरों से डिब्बी को देखा। पूछा”यह क्या है?”
“खुद ही देख लीजिए।”
सुधीर बाबू ने डिब्बी खोला और अवाक रह गए”यह तो सिंदूर की डिब्बी है मनमतिया! इसे साथ लेकर चलने का मतलब?”
“हां, सिंदूर की डिब्बी है। अब यही मेरे जीवन की अंतिम अभिलाषा है। जीवन की सबसे बड़ी इस खुशी से अब तक वंचित रही हूं। वही खुशी आज मैं आप से मांगती हूँ। आज इस एतिहासिक दिन में मेरी मांग भर कर एक पूर्ण औरत बना दो, मेरी मांग भर दो- बाबू! जो कभी भरा ही नहीं गया।”और मनमतिया सुधीर बाबू के आगे घूटने के नीच साड़ी ओढ़कर बैठ गई थी।
जीवन में कभी ऐसी घड़ी भी आएगी- सुधीर बाबू ने कभी सपने में भी नहीं सोचे थे। बस मनुष्य को मनुष्य की तरह जीवन जीने का हिमायती रहे थे। लेकिन मनमतिया के इस खुलेपन ने उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया था। हकलाते से बोल पड़े -“मनमतिया, क्या यह संभव है?”
“सुधीर बाबू, मर्दों की इस दुनिया में असंभव क्या है?”मनमतीया ने भावुक कंठ से कहा। उसकी पलकें भींगी हुई थी और होंठ थरथरा रहे थे। उसकी बांह पकड़कर सुधीर बाबू ने उसे खड़ा किए। उसके आँसू पोंछे। फिर बोले -“मनमतिया, साल- डेढ़ साल के इस छोटे से सफर में तुमने मुझसे जो कुछ मांगा और जो इच्छा जाहिर की, हमने उसे पूरी की, अब तुम जो मांग रही हो, जो तुम्हारी प्रबल इच्छा है, कभी- कभी जीवन में ऐसी अभिलाषाओं का पूर्ण न होने का मतलब सब कुछ खत्म होना नहीं होता। बस उस पल को महसूस कर जीवन का आनंद लेना चाहिए। बाकी तो तुम्हें हासिल है ही।”
— श्यामल बिहारी महतो
