अपनों का दर्द, प्रेम के विष में छिपा आत्मबोध
जीवन में सबसे तीव्र पीड़ा उस तीर की नहीं होती जो पराया चलाता है, बल्कि उस मुस्कान की होती है जो अपना देकर छीन लेता है। अपनों का दर्द बाहरी नहीं, आंतरिक होता है; वह त्वचा नहीं चीरता, बल्कि आत्मा को धीरे-धीरे गलाता है। यही वह यातना है जो हमें सोचने पर मजबूर करती है कि स्नेह और पीड़ा का स्रोत एक ही कैसे हो सकता है।दार्शनिक दृष्टि से देखें तो अपनों का दर्द आत्मा के जागरण का माध्यम है। जब जीवन हमें अपने ही रिश्तों से चोट पहुँचाता है, तब हमारी चेतना भौतिक सुखों से ऊपर उठती है। हम यह समझने लगते हैं कि प्रेम, स्वामित्व नहीं है, वह एक अर्पण है, और हर अर्पण में हानि की संभावना निहित होती है।
अपनों का दर्द हमें सिखाता है कि स्नेह में अधिकार जितना अधिक हो, उतनी ही गहरी चोट उसका अभाव देता है। इसलिए सच्चा प्रेम तब जन्म लेता है जब हम किसी को चाहें, बिना उसे अपने होने की शर्त पर बाँधें।यह पीड़ा हमें निर्मल बनाती है। जो भीतर से टूटा है, वही करुणा को वास्तविक रूप में समझ सकता है। यह टूटन ही हमें दूसरों के दुख को महसूस करने की क्षमता देती है। इसीलिए, अपनों का दिया गया दर्द अंत नहीं, आरंभ है , आत्म-साक्षात्कार का आरंभ। यह हमारे अस्तित्व से झूठ के आवरण हटाकर सत्य का परिचय कराता है, जहाँ हम समझते हैं कि प्रेम में पीड़ा उसका विरोध नहीं, उसका प्रमाण है।
— डॉ मुश्ताक अहमद शाह सहज
