जिंदगी मैं भी एक मुसाफिर हूं
राहें अनजानी,
कदमों की धूल में भी,
सपनों का मौसम।
भोर की किरणें,
थके दिल को छू जाएं,
नयी उमंगें हैं।
पथरीली डगर,
फूलों से बातें करती,
मेरी तन्हाई।
हवा का झोंका,
बीते लम्हों की खुशबू,
ले आया फिर से।
बारिश की बूँदें,
चुपके से कहती मुझसे,
मत थक मुसाफिर।
सूरज ढलता है,
पर उम्मीदें जगती हैं,
हर सांझ नई है।
पगडंडियों में,
छिपा है इक मंज़िल भी,
जो बस दिल जाने।
जिंदगी कहती,
चलते रहना ही सत्य,
यही यात्रा है।
— डॉ. अशोक
