दो गीत
1-
विरह की हवा चली है घर आ जाओ न।।
देखो सिंदूरी शाम ढली है घर आ जाओ न।
दिल के सूने पर्वत पे पिय गम की बदरिया छाई।
आंखों के आंगन में भर भर रिमझिम बरखा लाई।।
विरह में तड़पे मन – भंवरा और तड़पाओ न।
देखो सिंदूरी शाम ढली है घर आ जाओ न।।
स्वप्न सलोने झुलस न जाएं तन्हा तन्हाई में।
उम्र कहीं यह बीत न जाए यूं ही जुदाई में।।
विरही मन में आग जली है और जलाओ न।
देखो सिंदूरी शाम ढली है घर आ जाओ न।।
तिनकों का यह नीड़ भला है महल – चौबारों से।
देखो ह्दय का अंबर भरा है प्रेम – सितारों से।
अब मिलन की चाहत को पंख लगाओ न।
देखो सिंदूरी शाम ढली है घर आ जाओ न।।
सूना अंबर सूनी धरती सब कुछ सूना है।
घट भी मरघट पट भी मरघट सबकुछ सूना है।।
उड़ते पंछी जमीं पे आओ अंगना गाओ न।
देखो सिंदूरी शाम ढली है घर आ जाओ न ।।
— अशोक दर्द
2.
रात की खामोशियों से शब्द मांगते रहे।
आसमां की तख्तियों पे दर्द टांकते रहे।।
पीठ पर लदे हुए थे सपने कई उधार के।
रास्ते थे बंद सारे हाट और बाजार के।।
थे नुकीले शब्द सारे स्वार्थी संसार के ।
कौन बांचता यहां शब्द चार प्यार के।।
थके थके बुझे बुझे हम वक्त हांकते रहे।
आसमां की तख्तियों पे दर्द टांकते रहे।।
पता नहीं यह भेड़ -भीड़ थी किधर चली।
इस बात को समझते हुए शाम आ ढली।।
हर और उग रही थी जब शाम की कली।
दीवाने हो के फिरते रहे हम गली – गली।।
बदहवास हो के फिर दीवारें फांदते रहे।
आसमां की तख्तियों पे दर्द टांकते रहे।।
राहें थीं हजार मगर सपने बेशुमार थे।
मायावी इस तिलिस्म से कितने हम बेजार थे।
चल सके न रुक सके कितने हम गंवार थे।
फूलों भरी राहों ने भीतर छुपाए खार थे।।
हम देर तलक राहों का मिज़ाज भांपते रहे।
आसमां की तख्तियों पे दर्द टांकते रहे।।
— अशोक दर्द
