गीत
पूर्ण श्रद्धा से झुकाकर सर समय के सामने
कर हवाले देर के अँधेर के साए घने।
मौन मन में कर नियोजित जीत की जयकार को
फिर बढ़ो संघर्ष पथ पर छोड़ पीछे हार को।।
मन मनन में व्यस्त हो तन कर्म के पथ पर चले
पग धरें मिलकर निरंतर मंत्रणा के काफ़िले।
अनछुआ जो रह गया उस हर विषय पर बात कर
जीत के संघर्ष की फ़िर से नयी शुरुआत कर।।
टीस वाले शूल देगा हर्ष वाले फूल भी
ये कभी अनुकूल होगा तो कभी प्रतिकूल भी।
धार पाये धैर्य को जो जन समय प्रतिकूल में
शूल परिवर्तित किये उनके समय ने फूल में।।
जब तलक अपनी कमी का आकलन होगा नही
पूर्ण तब तक व्यक्ति का कोई जतन होगा नही।
श्रेष्ठता के पात्र को जी भर परखता है समय
फिर किसी के सर विजय का ताज रखता है समय।।
हर परिस्थिति के समेकित पूर्ण कायाकल्प की
हर पराजय है परीक्षा धैर्य की संकल्प की।
हाँ मरेंगे स्वप्न कुछ पर मन कभी मत मारना
हर कदम संघर्ष करना हौसला मत हारना।।
— सतीश बंसल
