‘बोझ’ तले दबते राज्य
ऋण के ‘बोझ’ तले दबते जा रहें राज्य,
इस पर नेताओं की ‘सत्ता’ अविभाज्य।
‘फ्रीबी’ के नाम ऐसी योजनाएँ चला रहे,
बिजली-पानी ‘बिल माफ’ किये जा रहें।
राज्य राशि प्रतिमाह जमा किये जा रहें,
किसानों-मातृशक्ति के खातों में आ रहे।
ये राज्यों की वित्तीय स्थिति गिरती रहीं,
खर्च को वहन करने की स्थिति ना रहीं।
यूं मजबूरी में योजनाओं को चलायमान,
सत्ता को बरकरार रखने की ओर ध्यान।
बाजार से ऊंची ब्याज दर ऋण लेने लगे,
लोकलुभावन में राजनीति को ढोने लगे।
— संजय एम तराणेकर
