गीत/नवगीत

गीत

सत्य भोगता दुख जीवन में, पाता है अपमान यहाँ।
झूठे और फरेबी का ही होता है सम्मान यहाँ।

मूल्य हीन नर होता जाता मर्यादा दम तोड़ रही।
संस्कार की अनुपम पूँजी,धीरे से रुख मोड़ रही।
अहंकार छल दम्भ कपट का फैला है सामान यहाँ।
सत्य भोगता दुख……….

इस बदलावी युग में अपने,अपनों से ही दूर हुए।
रिश्ते नातों की मर्यादा लांघ-लांघ नासूर हुए।
टूट गया आधार घात से दिशा हीन संतान यहाँ।
सत्य भोगता दुख……….

खास हुआ करते जो अपने ,वह ही धोखा देते हैं।
मात-पिता को बोझसमझते,असहनीय दुख देते हैं।
उम्र नहीं पूरी जी पाये ,पहुँच गए शमशान यहाँ।
सत्य भोगता दुख………

फैशन का बाजार खुल गया,स्त्री वस्त्र विहीन हुई।
धर्म और ईमान बिक गया,जीवन की गति क्षीण हुई।
कैसे युग परिवर्तन लाएं व्यक्ति हुआ बेईमान यहाँ।
सत्य भोगता दुख……….

किया सत्य को अपमानित पर सत्य नहीं झुकने वाला।
झूठ फरेबी भले फले पर शिखर नहीं चढ़ने वाला।
झूठ होलिका सम जलता है ,सच प्रहलाद महान यहाँ।
सत्य भोगता दुख……….

युग बदले पर मूल्य न बदलो मर्यादा और मान रखो।
जो जिसका आभूषण है उसको साधो और शान रखो।
नव उमंग के साथ बढ़ो मिल पालो अखिल जहान यहाँ।
सत्य भोगता दुख……….

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016