जरूर कोई बात है
धुरंधर लठैत मुस्कुरा रहा है,
विरोधी लठैत भी मुस्कुरा रहा है,
पता करो पीछे जा भौंकने वालों
दोनों मिलकर कोई खिंचड़ी तो नहीं पका रहा है,
हर कोई इन पर भरोसा कर रहा
मगर ये भरोसे के काबिल नहीं है,
नहीं पता तो चुप रहा कीजिए जनाब
सपने में भी मत कहना कि ये
हमारी बर्बादी में बिल्कुल शामिल नहीं है,
मत ताकते रहो चेहरा और लिबास,
खोजो और ढूंढो कहां है कालिख छुपा खास,
कहीं ढंक ले तुम्हें वातावरण आभासी,
कोई भी बन सकता है अडिग सत्यानाशी,
अतीत के अपने अंजाम क्या याद नहीं,
उनके पुरखों के कर्म कभी लगे सही?
बहुतों के कर्म सही लगते हैं होते नहीं,
वे कुकर्म भूल जाते हैं उसे कभी ढोते नहीं,
बावरे मन और बावरे चित्त लेकर
अब तक कितनों को हम समझ पाये हैं,
थोड़े की चाह में सब कुछ तो लुटाये हैं,
क्यों नहीं दिख रहा लेकर खड़े वो खड्ग व ढाल,
मुस्कुराते चेहरे पर लट्टू होना छोड़ो प्यारे
नजर दौड़ा देखो तो सही बिछे जाल ही जाल।
— राजेन्द्र लाहिरी
