अपना होना चाहिए गुणगान
बिना तार के इस ज़माने में चलते हैं फोन
लकड़ी बिना जलाये चलती है गैस
कारें बिना चाबी के चल रही
बिना घी के रोटी खाकर कर रहे सब ऐश
बिना ट्यूब के चलते पहिये
बिना बाजू के हो गए परिधान
युवा दर दर घूमें होकर बेरोजगार
नेताओं को शर्म नहीं जो दें इस बात पर ध्यान
रिश्ते हो गए बेमतलब के
नज़रिया हो गया बेपरवाह
पत्नियों को डर नहीं पति का
उलझते रहते खाहमखाह
भावनाएं किसी में रही नहीं
शिक्षा हो गई बिल्कुल बेकार
संस्कार विहीन हो गए बच्चे
छोड़ दिये बुजुर्ग और घरबार
शान हमारी फिर भी अनोखी
उम्मीदे उड़ती फिरती आसमान
काम कोई नहीं करना चाहता
यह देखकर खामोश हो गई ज़ुबान
खा रहे सब बी पी मधुमेह की दवाई
संस्कार बिना किस काम की पढ़ाई
संवेदनहीन हो गए परवाह नहीं किसी की
तैयार बैठे रहते हैं करने को लड़ाई
अहंकारी बड़े खुद की इज़्ज़त को देते अधिमान
स्वार्थी और मतलबी हो गया इंसान
अपनी अपनी पड़ी है सबको दूसरों से क्या लेना
अपना ही चाहिए सबको गुणगान
— रवींद्र कुमार शर्मा
