कुछ सीखा है
टूटे हुए लफ्ज़ों को
बटोर कर मैंने
लिखना सीखा है।
बहतें अश्कों के
दरिया में डूबकर
मैंना तैरना सीखा है।
जिस मिट्टी में
मेरे अपनों ने ही
मुझे मिट्टी किया,
उस मिट्टी से मैंने
खुद को ढालना सीखा है।
जिस ऊंचाई के
अहं में लोगों ने
मुझे नीचे गिराए,
उस ऊंचाई के भी
आसमाँ को मैंने
छूना सीखा है।
मुकाम-ऐ-दौर में
अपनों से ही मुझे
जो ठोकरें मिली,
उन ठोकरों से मैंने
आगे बढ़ना सीखा है।
— डॉ. राजीव डोगरा
