कविता

जिंदगी

बहुत तन्हा -तन्हा रही जिंदगी,
जैसी भी हो गुजरती रही जिंदगी ।

कभी गिरी तो कभी उठी जिंदगी,
बड़ा मजा आया तुझमें ए जिंदगी ।

वक्त ने ठुकराई हौसलों ने चलाई जिंदगी,
कैसे-कैसे कतरा -कतरा हुई जिंदगी ।

चोट पर चोट खाती रही जिंदगी,
किंतु क्षण-क्षण निखरती रही जिंदगी ।

किस-किस से कहें शितम ढा गई जिंदगी,
मेरा सर्वस्व मुझसे छीन ले गई जिंदगी ।

नूर चेहरे पर सजाती रही जिंदगी,
मेरी अनमोल काया खाती रही जिंदगी ।

हमेशा झूठे-सच्चे ख्वाब दिखाती रही जिंदगी,
जैसी भी थी गुलशन मेरा महकती रही जिंदगी ।

सहकर पीर जुदाई की जीती रही जिंदगी,
गम के साये में भी मुस्कुराती रही जिंदगी ।

जब तक समझ में तू आई जिंदगी,
मुट्ठी से रेत की तरह निकल गई जिंदगी ।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111