शोक सभा
अभी हाल ही में मुझे एक प्रार्थना सभा अर्थात शोक सभा और रस्म पगड़ी आयोजन में जाने का अवसर मिला। इलाके के एक मध्यम वर्गीय उद्योगपति की पत्नी का देहांत हुआ था।हार्दिक दुख का विषय था और हमारे मन में परलोक सिधारने वाले के लिए पूरी श्रद्धांजलि भरी हुई थी। लेकिन जो कुछ वहां पर जाकर देखा उस से मन बहुत दुखी हुआ।
बड़े हाल में शोकसभा का आयोजन किया गया था, उसके बाहर खाने-पीने की व्यवस्था भी थी। लोग इस तरह वहां खानेपीने में लगे थे जैसे किसी शादी विवाह में मौज मस्ती करने आए हो। खाने में भी बहुत सी चीज खाने की थी ,पूरा भोजन, ,चायपानी ठंडा काफी सब की व्यवस्था थी।
मंच पर विराजमान पंडित जी भी कुछ भजन कीर्तन या कुछ मन को छू लेने वाली बातें ना करके यहां वहां की बातें कर रहे थे जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं था और शायद उनकी बात में कोई ध्यान भी नहीं दे रहा था. मैंने यह भी देखा कि इस शोकसभा के लिए कई समाचार पत्रों में बड़े-बड़े विज्ञापन भी दिए गए थे। यह उद्योगपति एक धार्मिक संस्था के प्रधान भी हैं ,और एक राजनीतिक पार्टी से भी उनका गहरा संबंध है। इस शोक सभा में बहुत से प्रमुख व्यक्ति उपस्थित थे जिन्होंने जिन्होंने बारी-बारी से उसे उद्योगपति के गुण अधिक गाए। दिवंगत आत्मा के प्रति श्रद्धांजलि औपचारिक लग रही थी।
दूसरी तरफ देखा जाए तो हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी की माताजी का कुछ समय पहले देहांत हुआ था ,एक सीधे-साधे धार्मिक संस्कारी रीति के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया। कोई दिखावा नहीं कोई शोर,प्रचार नहीं , कोई भीड़भाड़ नहीं और प्रधानमंत्री अपना काम निपटाकर, पारिवारिक जिम्मेदारी निभाकर, अपने काम में लग गए। दुख की बात है कि ऐसे दुखी मौके पर भी कुछ लोग अपनी हैसियत का दिखावा करने में लगे रह जाते हैं,या समय के साथ साथ हर खुशी या ग़म के आयोजन का रूप ही बदल गया है।अपनी राय दें।
धन्यवाद
— जय प्रकाश भाटिया
