गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

निराश में दुख होता दिखाई देता है।
फिर देख सुंदर सपना दिखाई देता है।।

चली जो टूट अभी आस तू न घबराना।
इसी में जोश बढ़ता दिखाई देता है।।

ले जा रहे कटते ही शजर अभी सारे।
मुझे तो जंगल कटता दिखाई देता है।।

बजी ही जाती है घंटी मंदिरों में ही।
मुझे वहाँ कोई चलता दिखाई देता है।।

उठा धुआँ अब चारों तरफ़ वहाँ देखो।
यहाँ- वहाँ सब उजड़ा दिखाई देता है।।

दिया जो साथ निभाना तुम्हीं उम्र भर को।
क़दम-क़दम अब ख़तरा दिखाई देता है।।

अब ग़फ़लत में पड़े ज़िंदगी हमारी क्यों।
अभी चमकता सितारा दिखाई देता है।।

ख़ुदा का साथ ही लगता यहाँ सदा प्यारा।
( मुझे तो ग़ैर भी अपना दिखाई देता है।। )

कभी सता न किसी को हृदय लगा के ही।
सभी का दिल ही टूटा दिखाई देता है।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’