कविता

दहकता मौन

दहकता मौन
कोई पीड़ा थी मन में –
वह शब्दों का नहीं,
ऑंसू बनकर भी नहीं गिरती।
वह बस भीतर कहीं-
धीमे ताप-सी दहकती रहती है।

यह आज की बात नहीं –
सालों से लगी हुई है;
अंतरंग की यह उद्विग्नता,
एक सुलगती आग की तरह
अंतहीन जलती चली जाती है।
कब बुझेगी-कहना कठिन है।

इसे न उठा पाता हूॅं,
न अपने भीतर समेट पाता;
विचारों में मथकर
कविता के रूप में
धीरे -धीरे पी जाता हूॅं।

पीड़ा की इस दुर्बलता को
चिंतन में ढालकर
शक्ति में बदलता हूॅं।
और लोक-हित के कार्यों में
फिर से संलग्न हो जाता हूॅं।

हे पीड़ा!
मत समझो कि मैं कमजोर हूॅं –
मैं अनंत का साधक हूॅं।
हर घाव को एक पाठ बनाकर
दुनिया तक ले चलता हूॅ।

पी. रवींद्रनाथ

ओहदा : पाठशाला सहायक (हिंदी), शैक्षिक योग्यताएँ : एम .ए .(हिंदी,अंग्रेजी)., एम.फिल (हिंदी), सेट, पी.एच.डी. शोधार्थी एस.वी.यूनिवर्सिटी तिरूपति। कार्यस्थान। : जिला परिषत् उन्नत पाठशाला, वेंकटराजु पल्ले, चिट्वेल मंडल कड़पा जिला ,आँ.प्र.516110 प्रकाशित कृतियाँ : वेदना के शूल कविता संग्रह। विभिन्न पत्रिकाओं में दस से अधिक आलेख । प्रवृत्ति : कविता ,कहानी लिखना, तेलुगु और हिंदी में । डॉ.सर्वेपल्लि राधाकृष्णन राष्ट्रीय उत्तम अध्यापक पुरस्कार प्राप्त एवं नेशनल एक्शलेन्सी अवार्ड। वेदना के शूल कविता संग्रह के लिए सूरजपाल साहित्य सम्मान।