दहकता मौन
दहकता मौन
कोई पीड़ा थी मन में –
वह शब्दों का नहीं,
ऑंसू बनकर भी नहीं गिरती।
वह बस भीतर कहीं-
धीमे ताप-सी दहकती रहती है।
यह आज की बात नहीं –
सालों से लगी हुई है;
अंतरंग की यह उद्विग्नता,
एक सुलगती आग की तरह
अंतहीन जलती चली जाती है।
कब बुझेगी-कहना कठिन है।
इसे न उठा पाता हूॅं,
न अपने भीतर समेट पाता;
विचारों में मथकर
कविता के रूप में
धीरे -धीरे पी जाता हूॅं।
पीड़ा की इस दुर्बलता को
चिंतन में ढालकर
शक्ति में बदलता हूॅं।
और लोक-हित के कार्यों में
फिर से संलग्न हो जाता हूॅं।
हे पीड़ा!
मत समझो कि मैं कमजोर हूॅं –
मैं अनंत का साधक हूॅं।
हर घाव को एक पाठ बनाकर
दुनिया तक ले चलता हूॅ।
