इत्मिनान
कोई गिला रहा नहीं,
न कोई शिकवा अब है।
ज़िंदगी में आए इत्मिनान तो
हो जाए गुम हर डर है।
जीना कठिन था सही,
पर हौसलों से राह बन गई।
थकी हुई रूह को भी
फिर से ऊर्जा मिल गई।
हर सुबह की धूप में उम्मीद
फिर से खिलखिलाती है।
दुनिया के रंग बहुत देखे,
हर रंग में स्याही थी।
जलती रूहों ने तपिश भी ली,
हर चाह आह से बंधी थी।
कब कौन अनजाना
सहारा बन जाए,
कौन अपना दगा दे जाए,
जीवन की राहें उलझी बड़ी।
— मुनीष भाटिया
