कविता

इत्मिनान

कोई गिला रहा नहीं,
न कोई शिकवा अब है।
ज़िंदगी में आए इत्मिनान तो
हो जाए गुम हर डर है।
जीना कठिन था सही,
पर हौसलों से राह बन गई।
थकी हुई रूह को भी
फिर से ऊर्जा मिल गई।
हर सुबह की धूप में उम्मीद
फिर से खिलखिलाती है।
दुनिया के रंग बहुत देखे,
हर रंग में स्याही थी।
जलती रूहों ने तपिश भी ली,
हर चाह आह से बंधी थी।
कब कौन अनजाना
सहारा बन जाए,
कौन अपना दगा दे जाए,
जीवन की राहें उलझी बड़ी।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com