मेरी बेवक्त खांसी से नफ़रत है
सन्नाटा छा गया
बेचैनी की आहट में
खांसी गूंज उठी।
अँधेरी रातें
हर साँस में खिंच गई
बेचैन लम्हें।
धीमी रोशनी में
टूटी हुई सांसें बोलीं
मन घबराया।
छोटी खांसी भी
अनचाही आवाज़ बनकर
शांति भंग करे।
धैर्य की कोशिश
हर कण में लड़ रही
सहनशील मन।
भीड़ के बीच में
अचानक खांसी आए तो
लज्जा चुभे।
सर्दियों की हवा
सहारा नहीं देती
साँसें सिकुड़ें।
टिपटिपाती बूंदें
जैसे खांसी की तरह
धैर्य झकझोरें।
मन की तन्हाई
छोटे-छोटे काँपते पल
ख़ुद को डसें।
स्निग्ध दवा की खुशबू
शांति लौटाए धीरे-धीरे
साँसों में बल।
खांसी की आदत
नफरत में ढली हुई
जीवन की छाया।
धैर्य और हौसले से
हर बेवक्त खांसी भी
सहनशील बनती।
— डॉ. अशोक
