लघुकथा – विडम्बना
आँगन में खेलते बच्चों को श्यामा आवाज लगाती है ! चलो आओ खेलना बंद करो बच्चो !! देखो मैने भोजन में कुछ खास बनाया है | तीनो बच्चे माँ की आवाज सन खुशी खुशी दौड़ आते हैं | माँ – माँ क्या बनाया है ? बहुत अच्छी सुगंध आ रही है ,मुन्नी बोल उठी ! चुप होकर बैठ जा किनारे पहले पहले तो मेरा राजा बेटा मुक्कू ही खाएगा |
मुक्कू बोला मुन्नी क्यों नहीं ?वो तो छोटी है और भूखी भी | मुझे तो तुमने कुछदेर पहले ही दूध जलेबी खिलायी थी……अभी मै नही खाऊँगा ! मुझे भूख नही |बड़की दीदी और मुनिया को खिला दो |
मुनिया को खिला दो बड़बड़ाती है चुप चाप बैठ ! बड़ा आया भूँख नही है… खाएगा नहीं तो ताकत कहाँ से आएगी | तुझे बडे होकर बड़ा काम करना है |आ बैठ तुझे अपने हाथो से खिलाती हूँ | इन दोनो का क्या बडी होकर बच्चे जनना और घर बार ही तो देखना है |
माँ मुझे भी भूख लगी है सुबह नाश्ता भी नही किया था बड़की बोली | मुकुआ की सुबह की थाली का बचा तो पहले खा ले भूख बाकी रहे तो रसोई से लेलेना |
मुन्नी अपलक अपने भाई को देख रही थी और सोंच रही थी काश माँ मुझे भी अपने हाँथो से खिलाती | एक प्र्श्न उसके जहन में उभरा अनायास ही वह पूछ बैठी . . . . माँ मुझे कहाँ से लायी हो और भाई को कहाँ से लायी ?
ये क्या पूछ रही है रे मुनिया ? बताओ ना माँ . . बताओ . . .
अरे दोनो के जनम का एक सा होवे है पगली | भगवान ने पहले भाई को मेरी गोदी में डाला फ़िर तुझे ; तभी तो तू छोटी है | फिर तू क्यों मुक्कू और हममे भेद करती है |मुक्कू को स्वादिस्ट भोजन देती और हमे बासी भोजन देती है | तू मुझे अपने हाथ से क्यों नही खिलाती ? ? ? ? ?बोल न माँ बता न माँ कुछ तो बोल मै भी तो तेरा ही अंश हूँ तुम से निर्मित और पल्लवित हुयी हूँ | फ़िर क्यों तुम्हारे प्यार को तरसती हूँ | बोलो ना माँ . . .
मेरी प्यारी माँ आआआआआ. .
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
