बीत रहे हैं दिन
गुमसुम – गुमसुम चुप्पी ओढ़े बीत रहे हैं दिन
हर अभाव के नोक – झोंक में चुभते हैं दुर्दिन
कैद हवा को कर महलों में नयी सदी जीते
रोज आधुनिक भाग – दौड़ का कुंठा – विष पीते
भोर – साँझ की वेला ओझल चंदा लगे मलिन
अब तो पनघट-पनिहारिन की पायल – धुन है गुम
मौसम – गंध हुई बंजारिन संवेदन गुमसुम
नयनों का संवाद मौन है बोझिल है पल – छिन
पतझड़ – सी रसहीन हो गई रिश्तों की राहें
स्वर्णमहल में ही जीने की सबकी हैं चाहें
दिन की चिंताएँ पहाड़ – सी रातें हुईँ कठिन
— मार्त्तण्ड
