गीत/नवगीत

बीत रहे हैं दिन

गुमसुम – गुमसुम चुप्पी ओढ़े बीत रहे हैं दिन
हर अभाव के नोक – झोंक में चुभते हैं दुर्दिन

कैद हवा को कर महलों में नयी सदी जीते
रोज आधुनिक भाग – दौड़ का कुंठा – विष पीते

भोर – साँझ की वेला ओझल चंदा लगे मलिन

अब तो पनघट-पनिहारिन की पायल – धुन है गुम
मौसम – गंध हुई बंजारिन संवेदन गुमसुम

नयनों का संवाद मौन है बोझिल है पल – छिन

पतझड़ – सी रसहीन हो गई रिश्तों की राहें
स्वर्णमहल में ही जीने की सबकी हैं चाहें

दिन की चिंताएँ पहाड़ – सी रातें हुईँ कठिन

— मार्त्तण्ड

मांगन मिश्र 'मार्त्तण्ड'

प्रधान संपादक " संवदिया ' साहित्यिक त्रैमासिक, फारबिसगंज-854318 (बिहार) मो. : 9973269906 मेरी अब तक 9 पुस्तकें प्रकाशित हैं तथा राष्ट्रीय स्तर की कई दर्जन पत्र/पत्रिकाओं में गीत, ग़ज़ल, नवगीत, कविता, दोहे, कहानी, आलेख, यात्रा-वृत्तांत तथा समीक्षाएँ निरंतर प्रकाशित हो रही हैं।