80 के दशक का सिनेमा
1980 के दशक का सिनेमा अपने आप में एक सांस्कृतिक और सामाजिक घटना था। उस दौर में बड़े पर्दे पर दिखने वाली फ़िल्में केवल मनोरंजन नहीं करती थीं, बल्कि उनमें ज़िंदगी, रिश्ते, समाज और युवाओं के सपने भी जुड़े होते थे। इस समय में फ़िल्में देखने का अनुभव आज की तुलना में कहीं अधिक ख़ास और यादगार था।बड़े पर्दे की चमक और जादू80 के दशक में टीवी का प्रभाव सीमित था और मोबाइल जैसी कोई सुविधा तक नहीं थी, इसलिए सिनेमा हॉल किसी त्योहार से कम नहीं होते थे। फ़िल्में बड़े पर्दे पर देखना एक अलग ही अनुभव था,धड़कते दिलों, जोरदार तालियों, और दर्शकों की आवाज़ों के बीच। लोग अपनी पसंदीदा फ़िल्मों के हीरो-हीरोइन को देखकर खुद को उनके जैसी शक्ति और बहादुरी का एहसास देते थे। कई बार दर्शक अपने हीरो की तरह ही तैयार होकर हॉल आते, उनके डायलॉग बोलते और उनकी स्टाइल नकल करते।हीरो और उनकी छवि फिल्मों के नायक जैसे अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती और नायिका जैसे, रीना रॉय, स्मिता पाटिल हेमा मालिनी आदि ने लोगों के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाई। अमिताभ बच्चन के “एंग्री यंग मैन” वाली छवि युवाओं में खासा लोकप्रिय थी। लोग उनके डायलॉग, जैसे “रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं” या “मैं हूं पुलिस…” को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी दोहराते। यह दौर ही ऐसा था जब एक फ़िल्म का गाना हिट होना पूरे इलाके में गूंजता रहता। फ़िल्मों का सामाजिक प्रभाव फिल्में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, सामाजिक संदेश भी देती थीं। कई फ़िल्मों में उस समय की सामाजिक समस्याओं जैसे गरीबी, भेदभाव, और भ्रष्टाचार को दिखाया गया, जिससे दर्शक खुद को फिल्म के किरदारों के साथ जोड़ पाते। 80 के दशक में “शोले,” “दीवार,” जैसी फ़िल्में लोगों के दिल में गहरे उतर गईं और आज भी लोकप्रिय हैं।सिनेमा और लोकजीवन के बीच जुड़ाव सिनेमा हॉलों की क़तारों में लगना, टिकट पाने का इंतज़ार करना, और फ़िल्मों के पोस्टर देख-देखकर उत्साह मनाना भी एक बड़े त्योहार जैसा होता था। कम्पाउंडों और छोटे-छोटे गलियारों में बच्चे अपने पसंदीदा फ़िल्मी हीरो के नकली झगड़े याद करते, और गली में किस्सा-प्रसिद्ध डायलॉग बोलकर मित्रों को हँसाते।कुछ रोचक बातेंउस समय सिनेमा में विशेष तौर पर इंटरवल के बाद का सीन दर्शकों का क्लाइमेक्स रहता था, जिसमें कहानी का रोमांचक हिस्सा आता था, और दर्शक बहस में लग जाते कि अगला पर्दा क्या दिखाएगा।फिल्म की टिकट पाने के लिए सुबह से सिनेमाघर के बाहर लाइनों में लगना आम बात थी।फिल्मों के गाने अक्सर रेडियो पर बजते और लोग उन्हें गुनगुनाते हुए घर-घर जाते।उस दौर में रंगीन फ़िल्में भी खासियत थी क्योंकि रंगीन सिनेमा को देखने का नया जोश था।कई बार फ़िल्म के प्रमोशन के लिए नायक-नायिकाएं शहरों में जाकर मेलों जैसी जगहों पर फैंस से मिलते।80 का दशक आज भी सिनेमा प्रेमियों के लिए सुनहरी यादों से भरा है। उस बड़े पर्दे की चमक और उस ज़माने की सिनेमा के प्रति दीवानगी, जिसने लोगों को दिनभर की थकान भूलाकर सपनों की दुनिया में जाकर दूर हो जाती थी ,, वो समय अपनी खासियतों के साथ अमर रहेगा।
— डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
