कहानी – प्रेम की परिभाषा
सुबह के क़रीबन नौ सवा नौ का ही समय होगा । दिल्ली मेट्रो हर रोज़ की तरह खचाखच भरी हुई थी । इस समय दिखने वाले ताज़ातरीन चेहरे शाम में वापसी पर बिलकुल बुझे हुए चिराग़ों की माफ़िक़ ही प्रतीत होते हैं समीर को । ख़ुद वो भी तो तब तक निढाल सा ही हो जाता है न बिलकुल । नयी नयी लगी नौकरी में अपना बेहतरीन देने की ख़्वाहिश और बाक़ी सबके बीच अपनी एक अलग पहचान बनाने की जद्दोजहद । कुछ ही महीनों में सचमुच थकने लगा है वो । अपनी बाइक से पहले ग़ाज़ियाबाद से वैशाली मेट्रो फिर राजीव चौक से दूसरी मेट्रो बदलकर दिल्ली स्थित ऑफ़िस और फिर वापसी में भी यही बोरिंग सी प्रक्रिया । ‘ऐसे नहीं चलेगा बिलकुल , मुझे दिल्ली में ही कोई पीजी वगैरह लेकर रहने होगा । यह भी कोई ज़िन्दगी है भला । बस भाग ही रहा हूँ , जबसे नौकरी लगी है ।’ वो आजकल यही सोचने लगा था लौटते हुए । कल तो उसने घर पर भी एलान कर दिया था इस बात का । सुनकर मम्मी पापा चुप लगा गए थे । ‘बच्चा है अभी, समझ जाएगा कि आने – जाने को छोड़कर बाक़ी तो सारे आराम हैं ही न घर से जाने में । न खाने वगैरह की चिंता और न ही कोई अन्य काम । पैसे भी बचते हैं सो अलग । अभी वेतन भी इतना कहाँ है कि अलग रहना – खाना किया जा सके । खैर ….. !
कौशाम्बी स्टेशन पर आज कुछ अधिक ही लोग एक साथ चढ़े थे । खड़े होने की भी जगह नहीं मिल पा रही थी । जगह बनाने की धक्कामुक्की में एक लड़की तो बुरी तरह उससे टकरा गई थी । अगर वो सचेत नहीं होता तो दोनों में से एक तो ज़रूर ही गिर गिरा जाता । खुद को सँभालने की कोशिश में लड़की ने भी उसको कसके पकड़ लिया था । मगर दूसरे ही पल अहसास होते ही सॉरी कहते हुए झटक कर दूर भी हो गई थी । इन चन्द महीनों में ऐसा पहली बार हुआ था समीर के साथ । चन्द पलों में ही लड़की के जिस्म की महक उसके तन बदन में ऐसी समा गई थी कि मानो छोड़कर ही न जाना चाहती हो उसे । मदहोशी का यह आलम था कि कब राजीव चौक आ गया था और कब वो और लड़की दोनों उतरकर दूसरी ट्रेन में भी साथ बैठ गए थे पता ही नहीं चला था उसे । यह दूसरी ट्रेन में भी किसी लड़की के साथ बैठना उसके लिए इतना सुखद अनुभव था कि आज उसे रोज़ की तरह कोई थकान महसूस ही नहीं हो रही थी । बल्कि आज तो उसने घर में भी मम्मी पापा और छोटी बहन के साथ हँसते मुस्कुराते हुए समय बिताया था । बहन तो छेड़ भी बैठी यह कहकर “ आज कोई मिल गई है क्या भाई …बड़े फ़्रेश नज़र आ रहे हो !” गोया कि फ़्रेश नज़र आने का एकमात्र कारण ‘किसी उसका’ मिलना ही हो सकता है बस ! मगर यहाँ समीर के केस में बहन की बात तो सटीक ही प्रतीत हो रही थी न । अगले दिन न जाने किस उम्मीद में समीर की नज़रें कौशाम्बी स्टेशन से चढ़ने वाले लोगों में कल के खूबसूरत चेहरे को तलाशने लगीं थीं , जिसने पहली बार में ही उसका सुकून छीन लिया था । और इत्तफ़ाक़ की बात उसे ज़्यादा मेहनत ही नहीं करनी पड़ी । आज अपेक्षाकृत भीड़ कम थी और ट्रेन रुकते ही वो उसे आती हुई भी दिख गई थी । समीर यकायक समझ नहीं पाया था कि उसको सामने देखते ही उसका दिल क्यों कर इतनी तेज़ी से धड़कने लगा था । लड़की की नज़र उस पर पड़ी तो उसके चेहरे पर भी अनायास ही स्माइल आ गयी थी । कल तो घबराहट में समीर उसे अच्छी तरह देख नहीं पाया था लेकिन आज जब वो उसे देखकर मुस्कुराई तो समीर ने देखा कि उसकी मुस्कान बहुत मनमोहक थी । और साथ ही उसकी सूरत कितनी ही भोलीभाली और सुंदर । समीर के दिल ने चाहा कि काश कल जितनी भीड़ आज भी हो जाए और वो एक बार फिर उससे टकरा जाये । कल की उसकी खुशबू समीर को आज भी खुद में महसूस हुई । एक शेर अनायास ही मुहब्बत का जैसे उसके भीतर गुनगुनाने लगा था । ‘ कौन कहता है कि मुहब्बत की ज़ुबान होती है , यह तो वो शै है जो निगाहों से बयां होती है …. ।’ मुहब्बत के ख़्याल मात्र से ही वो शरमा सा उठा था।
उसके बाद तो जैसे यह रोज़ का सिलसिला ही बन गया था दोनों का । वो कौशाम्बी से बैठती , फिर वो दोनों राजीव चौक से साथ ही अपने अपने रस्ते दिल्ली उतर जाते । शाम को उसके टाइमिंग्स शायद अलग होते लेकिन समीर रास्ते भर उसे अपने सामने ही महसूस करता रहता और उसी ख़ुमारी में कभी मंद मंद मुस्कुराता सा और कभी खोया खोया सा घर आ जाता । उसे अगले दिन फिर से देखने की ख़लिश समीर को हर समय ख़ुशनुमा सा बनाए रखती । प्रेम की अनुभूति ऐसी सी ही होती होगी शायद, समीर सोचता और तब उसे अपनी बेरंग ज़िन्दगी बेहद हसीन लगने लगती ।
समय यूँ ही मेट्रो की रफ़्तार सा दौड़ता रहा था । हाँ नहीं दौड़ा तो उन दोनों के बीच ऐसा कुछ भी जो लड़की का तो पता नहीं लेकिन समीर के ख़्वाबों ख़यालों में तो अनवरत चलता ही रहा था इन दिनों । मगर हाँ रोज़ मिलते जुलते इतना तो ज़रूर हुआ ही था कि समीर की उसके लिए बचायी सीट पर अब वो बिना इंकार के बैठने लगी थी और आते जाते हाय हलो और बाय बोलने लगी थी । समीर का हर्षित मन इतने में ही मानो गुनगुनाता सा रहता । वो अब पहले वाले चिढ़ते खीझते समीर की जगह हँसते मुस्कुराते रहने वाला लड़का बन गया था , जिसे सब लोग पसंद करने लगे थे। ऑफ़िस में भी और घर में भी । प्रेम की अनुभूति निश्चित रूप से सारी दुनिया को ख़ूबसूरत बना देती है और सबको अपना।
इस दौरान एक दिन कुछ अलग सा हो गया। उस दिन पहली बार किन्हीं तकनीकी कारणवश ट्रेन की बिजली गुम हो गयी । यह हुआ तो केवल मात्र कुछ सेकेंड्स के लिए ही था मगर इतने से ही समय में दोनों के बीच शायद बहुत कुछ बदल गया था । अँधेरे में घबराई लड़की ने पास खड़े समीर का हाथ कसकर पकड़ लिया था और बदले में खुद पर उसके भरोसे को बनाए रखते हुए समीर ने उस कसावट को और बढ़ा दिया था। उस पल जैसे इतने दिनों से चुप्पी साधे चलती उनकी प्रेम कहानी को लफ़्ज़ मिल गए थे । थोड़ी थोड़ी बातचीत भी अब उनके दरम्यान होने लगी थी । मसलन आप इतने दिनों से एक ही किताब क्यों पढ़ रहीं थीं ? या सीट ख़ाली होने पर भी आप बैठते क्यों नहीं ? या कॉफ़ी पसंद हो तो पियें क्या कभी साथ में किसी स्टारबक्स या कॉफ़ी कैफ़े में ? या फिर आप सब लड़कियों की ही इतनी मदद करते हैं या सिर्फ़ मेरी …. ?’
एक दूसरे से पूछे गए इन प्रश्नों का सीधा साधा कोई जवाब किसी ने नहीं दिया कभी । वो या तो कुछ शर्मा गए या मुस्कुरा कर रह गये बस कुछ इस अंदाज़ में-
‘वो पूछ बैठे हैं हमसे कि हमें क्या चाहिए
अब क्या कहें कि हमें सिर्फ़ तुम चाहिए’
कुछ दिन और यूँ ही निकल गए फिर । हर बीतते दिन के साथ उनकी बातें भी अब बढ़ने लगी थीं और बातों की गहराई भी । मतलब कि अब एक दूसरे को जवाब सही सही मिलने लगे थे कम अज कम । लगा कि रिश्ता बस अब अपनी मंज़िल के बहुत क़रीब है । इतना क़रीब शायद कि हिम्मत करके अब बस अपना हाल ए दिल बयां कर ही दिया जाए । मन में यह ख़्याल आते ही उस रात समीर के दिल की बेताबी इतनी बढ़ गई थी कि न तो उसे भूख प्यास लगी और न ही सारी रात नींद आई । आँखें बस सुबह के उन सुहाने पलों के इंतज़ार में ही जागती रहीं जबकि वो उसका हाथ अपने हाथों में लेकर उससे अपनी पहली पहली मुहब्बत का इज़हार करेगा । और फिर उसकी हाँ के जवाब में ऑफ़िस से छुट्टी लेकर सारी दिल्ली में उसको अपने साथ लेकर घूमेगा । मौज मस्ती करेगा । झूम झूमके प्रेम तराने गायेगा और क़ुतुब मीनार की सबसे ऊँची इमारत से चीख चीखकर सारी दुनिया को बतायेगा कि उसे उसकी मोहब्बत मिल गई है ।
उस अगली सुबह उसे सरप्राइज़ देती हुई वो उसे वैशाली मेट्रो पर ही इंतज़ार करती हुई मिल गई थी । दिल में जैसे बेहद राहत सी महसूस हुई समीर को । इसका मतलब कि उससे भी अब कौशाम्बी तक का सब्र नहीं हुआ था । आह ! तो आग उधर भी बराबर ही लगी हुई थी ! समीर का मन जैसे दोगुना चौगुना हो गया था सोच कर । मगर उधर बात कुछ और थी । बताने की जल्दी इस बात की थी कि उसकी पहली पहली जॉब लग गई थी और उसे अब दिल्ली छोड़कर बंगलौर जाना था । आज उसका यह आख़िरी दिन था यहाँ । बताते हुए वो इतनी उत्साहित थी कि समीर के दिल के चटकने की आवाज़ भी उस तक नहीं पहुँच सकी थी । उसके महकते ख्वाबों के गुलिस्ताँ बिखरने को भी वो महसूस नहीं कर सकी थी । हाँ लेकिन समीर ने महसूस कर लिया था कि अन्तिम बाय बाय कहते समय उसकी आँखों में भी नमी के कुछ कतरे उभर ही आए थे । अपनी पहली मुहब्बत का यह अंदाज़ भी उसके दिल को छू गया था । वो समझ गया था कि हर किसी के लिए प्रेम की परिभाषा अलग होती है । उसके लिए उसका प्रेम साथी के साथ वाला भले ही न रहा हो मगर प्रेम के अद्भुत अहसासों वाला तो हमेशा रहेगा ही ।
उसे अहसास हुआ था पूरा कि उसका हाथ थामे थामे ही वो उतर गई थी और जल्दी ही भीड़ में भी खो गई थी । मगर उसके दिल में इस अहसास के साथ कि प्रेम हमेशा साथ रहने का ही नाम नहीं होता। कभी-कभी प्रेम वह भी होता है जो रोज़ एक ही मेट्रो में चढ़ता है, कुछ स्टेशन साथ चलता है, और फिर जीवन भर स्मृति बनकर दिल के किसी कोने में उतर जाता है।
कई साल बीत गए हैं समीर की इस प्रेम कहानी को मगर आज भी जब वह उसी समय वाली मेट्रो में बैठता है, तो भीड़ में अनायास ही उसकी आँखें उसे खोजने लगती हैं । उसे मालूम है कि वो अब नहीं मिलेगी उसे , फिर भी अनजाने ही उसकी निगाहें उसे तलाशती हैं , क्योंकि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में रहने नहीं आते, वो हमें शायद यह सिखाने आते हैं कि दिल धड़कना कैसे सीखता है ? दिल में यकायक भावनाओं की उथलपुथल कैसे मच उठती है ? अजनबी सा कोई आकर कैसे पल भर में आपको आपसे ही जुदा कर देता है ?
और शायद यही प्रेम की सबसे सही – सुंदर परिभाषा थी उसकी नज़र में ।
— रेनू ‘अंशुल’
