राजनीति

व्यूज की अंधी दौड़ में लहूलुहान होती सामाजिक मर्यादा

गुरुग्राम के एक स्टैंडअप कॉमेडी शो में ₹370 की बिरयानी की कीमत एक महिला की अस्मिता से लगाने वाले दर्शक का वीडियो और उस पर ताली पीटते कॉमेडियन प्रणीत मोरे का ठहाका सिर्फ एक तात्कालिक विवाद नहीं, बल्कि भारतीय स्टैंडअप कॉमेडी के उस गहरे नैतिक और वैचारिक पतन का दस्तावेज़ है, जो पिछले एक दशक से धीरे-धीरे हमारे समाज में पैठ बना रहा था। यह घटना साफ तौर पर रेखांकित करती है कि व्यूज, लाइक्स और वायरल क्लिप्स की अंधी दौड़ में हास्य और अश्लीलता के बीच का अंतर पूरी तरह समाप्त हो चुका है। जहाँ दर्शक हिमांशु जांगड़ा की नौकरी चली गई, वहीं प्रणीत मोरे को अपना सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर माफी मांगनी पड़ी। वहीं, दिवंगत अभिनेता इरफान खान की पत्नी सुतापा सिकदर से लेकर अभिनेत्री रश्मि देसाई तक ने इस खोखली माफी को सिरे से खारिज कर दिया। विवाद केवल यहीं नहीं थमा; इसी शो की एक अन्य क्लिप में एक महिला मेडिकल छात्रा ने मेडिकल कॉलेज में ‘डेड बॉडी’ के प्राइवेट पार्ट्स पर मज़ाक बनाने की बात गर्व से कबूल की, जिसने चिकित्सा जगत की नैतिकता और देहदान करने वाले परिवारों की भावनाओं को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया। यह अराजकता किसी एक मंच की नहीं, बल्कि उस ‘क्राउडवर्क’ फॉर्मेट की देन है, जहाँ बिना स्क्रिप्ट, बिना सेंसर और बिना संपादन के केवल तात्कालिक भीड़ को हंसाने के लिए किसी भी हद तक जाने की खुली छूट ले ली गई है। भारतीय स्टैंडअप कॉमेडी का इतिहास पिछले एक दशक में जितनी तेज़ी से व्यावसायिक रूप से समृद्ध हुआ है, वैचारिक और सामाजिक रूप से वह उतना ही सतही और खोखला होता गया है। आज डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का पूरा एल्गोरिदम रचनात्मकता से ज्यादा ‘शॉक वैल्यू’ और विवाद को बढ़ावा देता है। जब कलाकार को पता होता है कि जितना तीखा, अभद्र या विवादास्पद कंटेंट होगा, रील्स और शॉर्ट्स पर उतने ही मिलियन व्यूज मिलेंगे, तो वह सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रख देता है। अभिनेत्री रश्मि देसाई और आयशा खान का यह सवाल बेहद मौजूं है कि जब एक महिला की गरिमा को मंच पर तार-तार किया जा रहा था, तब उस हॉल में बैठे सैकड़ों लोगों में से एक भी व्यक्ति ऐसा क्यों नहीं था, जो उठकर इसका विरोध करता? सामूहिक हँसी अक्सर व्यक्तिगत विवेक को सुला देती है और यही इस डिजिटल इकॉनॉमी का सबसे खतरनाक पहलू है। जब हास्य का पैमाना केवल भीड़ का ठहाका बन जाए, तो वह कला नहीं, बल्कि एक अनियंत्रित तमाशा बन जाती है।

यदि हम पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों और इतिहास पर नज़र डालें, तो स्टैंडअप कॉमेडी का यह भटकाव हर दिशा में फैला है, चाहे वह धर्म हो, देश की सुरक्षा एजेंसियां हों, सेना हो या फिर लोक संस्कृति। साल 2021 में मुनव्वर फारुकी को इंदौर में हिंदू देवी-देवताओं और गृह मंत्री पर कथित अभद्र टिप्पणी के आरोप में करीब एक महीना जेल में बिताना पड़ा था। इसके बाद 2023 में भारतीय मूल की अमेरिकी कॉमेडियन जरना गर्ग का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने ‘19,000 हिंदू देवी-देवताओं’ का मज़ाक उड़ाया, जिसके खिलाफ देशव्यापी आक्रोश देखने को मिला और कई राज्यों में एफआईआर की मांग की गई। साल 2024 में पुनः मुनव्वर फारुकी को मुंबई के एक शो में कोंकणी समुदाय पर अपमानजनक टिप्पणी के लिए लिखित माफी मांगनी पड़ी। वर्ष 2025 में यह विवाद चरम पर पहुंच गया, जब महाराष्ट्र में महज दो महीनों के दौरान कुणाल कामरा, समय रैना और प्रणीत मोरे पर अलग-अलग मामलों में गंभीर एफआईआर दर्ज हुईं। कुणाल कामरा द्वारा राजनीतिक नेतृत्व पर किए गए कटाक्ष के बाद मुंबई के हैबिटेट क्लब में तोड़फोड़ हुई और बीएमसी की कार्रवाई झेलनी पड़ी। इसी तरह अतीत में तन्मय भट्ट द्वारा भारत रत्न लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर का मज़ाक उड़ाने पर भारी कानूनी और सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ा था, जबकि आंध्र प्रदेश में कॉमेडियन अनुदीप को अभिनेता व नेता पवन कल्याण पर की गई टिप्पणी के कारण पुलिस हिरासत में जाना पड़ा।

यह पूरा परिदृश्य दिखाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर एकतरफा ढाल तैयार की जा रही है। जब राजनेताओं, पुलिसकर्मियों या सेना के जवानों पर व्यंग्य किया जाता है, तो उसे लोकतांत्रिक अधिकार का नाम दिया जाता है, लेकिन जब इसी स्वतंत्रता का उपयोग किसी मृत देह के अपमान, किसी समुदाय की अस्मिता को ठेस पहुँचाने या महिला विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, तब इसे किस श्रेणी में रखा जाएगा? देश में हर साल हजारों स्टैंडअप शो होते हैं और इनके वीडियो यूट्यूब व इंस्टाग्राम पर करोड़ों की कमाई करते हैं। इस विशाल बाजार की अपनी एक सामाजिक जिम्मेदारी बनती है। एक जीवंत लोकतंत्र में सत्ता, रूढ़ियों और पाखंड पर तीखा कटाक्ष होना अनिवार्य है और भारत में ऐसे बेहतरीन कलाकार हैं, जो मर्यादा में रहकर यह काम करते हैं। परंतु जब पूरी इंडस्ट्री को एक ही तराजू में तौला जाता है, तो नुकसान उन वास्तविक कलाकारों का होता है, जो कला की समझ रखते हैं। प्रणीत मोरे का यह कहना कि ‘वह इंसान हैं और सीख रहे हैं’, एक पेशेवर मंच पर अपनी जिम्मेदारी से भागने जैसा है। यदि वीडियो को एडिट कर, उस पर आकर्षक टैग लगाकर जानबूझकर वायरल किया गया, तो कॉमेडियन इस प्रकरण में बराबर का भागीदार है। हास्य का मूल उद्देश्य समाज को आईना दिखाना और तनाव कम करना होता है, न कि किसी की गरिमा को कुचलना। सरकार या अदालतें कानून बनाकर मंच पर सेंसरशिप लागू नहीं कर सकतीं और न ही यह एक स्वस्थ समाज के लिए सही होगा। इसकी अंतिम रेखा उस दर्शक को ही खींचनी होगी, जो टिकट खरीदकर इन शो में बैठता है। जब तक दर्शक अश्लीलता, अभद्रता और संवेदनहीनता पर तालियाँ बजाना बंद नहीं करेंगे, तब तक व्यूज की भूख से तड़पते ये क्रिएटर मर्यादाओं को लांघते रहेंगे। समय आ गया है कि डिजिटल युग की इस ‘बर्बर हँसी’ के खिलाफ समाज स्वयं अपनी मूक सहमति को तोड़े और यह तय करे कि मनोरंजन के नाम पर किस हद तक नीचे गिरने की इजाजत दी जा सकती है।

अजय कुमार

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