कविता

कविता

एक छुपे हुए रोग की तरह
जो बार-बार
उभर आता है,
गहरी रातों में नींद तोड़कर
आँखों को धुंधला कर
देता है।
दिल की सूखापन को
सीधे सीने से
कह जानेवाला,
एक अजनबी-सी याद है
जो मुझे मेरा ही
एहसास दिलाती है।
कभी, कहाँ से
क्या करते हुए,
किस पल में
किस तरह,
किस अंदाज़ में
तेरे नाम में लिपटा
मैं एक अस्थिर यात्रा में था।

— एस. अमन्दा सरत्चन्द्र

एस. अमन्दा सरत्चन्द्र

श्री लंका