मैं धीरे धीरे सीख रहा हूं
मैं धीरे धीरे सीख रहा हूं
मैं सीख रहा हूं धीरे धीरे
मैं धीरे धीरे सीख रहा हूं,
मुझे अपना दुखड़ा किसी के आगे नहीं रोना है,
मुझे किसी पचड़े में पड़कर शांति नहीं खोना है।
मुझे किसी को बुरा और किसी को भला नहीं कहना है,
मुझे हर हाल में बस चुप ही रहना है।
मैं धीरे धीरे सीख रहा हूं,
मुझे केवल परिस्थिति को ही समझना है,
मुझे किसी के भी साथ नहीं उलझना है।
मुझे मोह नहीं करना है,
मुझे द्रोह नहीं करना है।
मैं धीरे धीरे सीख रहा हूं,
मुझे कुछ कुछ छोड़ते रहना है,
मुझे अध्यात्म पकड़ते रहना है।
मुझे व्रत-नियम पालन करना है,
मुझे प्रथम तो मोबाइल व्रत करना है।
मैं धीरे धीरे सीख रहा हूं,
मुझे कितना बदलना है ?
मुझे कुल मिलाकर बदलना है।
मुझे अपना महत्व नहीं खोना है,
मुझे आदमी से इंसान होना है।
— पुखराज छाजेड़
