मजबूरी
“मम्मी, कितना कम्बल रजाई मुझे ओढ़ा दी हो ।मुझे गर्मी लग रही है।थोड़ा पंखा चालू कर दीजिए न।”
बबलू ने कम्बल फेंकते हुए कहा।
“ओह!बेटा ,देखो कितनी ठंड है और तुम्हें गर्मी लग रही है।”
“अरे भई, भेड़ो के असली ऊन से बने कम्बल हैं ।कश्मीर से मैंने मंगवाया था ।पूरे पांच हजार के हैं।अरे पैसों में तो ही असली गर्मी होती है।पैसे है तो कड़कड़ाती ठंड भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती।” बबलू के पापा ने कहा ।
“हां, यह तो है।देखो मेरा यह शॉल पश्मीना शॉल है।इसमें मुझे ठंड नहीं लगती पर बाहर तो जैसे बर्फ पड़ रही है।बहुत ही ठंड पड़ रही है इस बार।”
मम्मी ने कहा।
बंगले के बाहर दरवाजे पर खड़ा गार्ड फ़टे कम्बल से अपने को ठंड से बचाने की कोशिश कर रहा था।
— डॉ. शैल चन्द्रा
