शोक
जब शोक हृदय में बैठ जाता है
चेहरा मुरझा जाता है
मन अति विह्वल हो जाता है
लेकिन इस शोक से लड़ना पड़ता है
लड़-लड़कर जीना पड़ता है ।
है सत्य मृत्यु
सच कह गया कहने वाला
बच सका न आज तक कोई
फिर मृत्यु शोक करना ही क्यों
है कौन प्राणी जगत में ऐसा
जिसका मृत्यु से पड़ा न पाला ।
भ्रमवश झूठ को जब सच समझा जाता है
ईश्वर से विश्वास डगमगा जाता है
कुछ जाने- अनजाने पाप उदय हो जाते हैं
आत्मा पर अंधकार का पर्दा गिर जाता है
मन अंधकारमय हो जाता है
तब शोक हृदय में छा जाता है ।
राम-कृष्ण, गौतम -रहीम सबने सही मृत्यु
जग को दिया बोध बुद्ध ने
जो आया है वो जाएगा
नित्यानित्य ज्ञान ही है
आत्मज्ञान और शोक मुक्ति का उपाय ।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
