गज़ल
प्रतिभा का होता न सम्मान खुदा खैर करें
दिन-रात है उसका अपमान खुदा खैर करें
उसकी बात का विश्वास हम कैसे करें
भीतर बैठा हुआ शैतान खुदा खैर करें
इस शहर के लोगों ने पहन रखा मुखौटा
कैसे करें अब हम पहचान खुदा खैर करें
बनाने को बना लिया बंगला आलीशान
रखा ना इसमें रोशनदान खुदा खैर करें
पार्टी में गली नहीं दाल तभी उसने तो
खोली उसने खुद की दुकान खुदा खैर करें
आपके शहर का अजीब रिवाज है यारों
पास रहते हैं पर अनजान खुदा खैर करें
खाते हो इस माटी का पर बजाते नहीं
तब छोड़ दे आप हिंदुस्तान खुदा खैर करें
युवा होकर जो करें बच्चे जैसी बातें
उसे कहें नहीं आप नादान खुदा खैर करें
रहते हैं जिसमें तीन प्राणी ही वहां पर
फिर भी उनका भव्य है मकान खुदा खैर करें
एक दिन गिरोगे रमेश निश्चित धड़ाम से
यदि भीतर करोगे अभियान खुदा खैर करें
— रमेश मनोहरा
