कविता
आज नील गगन से देखो
कैसे चांदनी उतर रही
झिलमिल सितारों के संग
नभ को कैसे चूम रही
मस्त गगन के झरोखों से
चांद भी क्या खूब लगता
मीठी मीठी मुस्कानों से
जग को किया है रौशन
इन चांदनी रातों को देखो
क्या कहना है इनका नजारा
जैसे प्रेमी संग प्रेमिकाएं
मन को कैसे लुभा रहे
मोर के संग मोरनी
बिना मेघ के नाच रही
ऐसे ही मन झूम रहा है
नभ को देखो छू रहा है।
— विजया लक्ष्मी
