मन की धूप-छाँह
मुझे पुरुष चाहिए—
कभी शरण की छाया बनकर,
कभी वंश की दीपशिखा बनकर,
कभी जीवन-पथ का सहयात्री बनकर।
और जब अँधेरा घिर आए,
तो वही छाया
क्यों सबसे पहले दोषी ठहराई जाए?
घर के आँगन में
स्त्रियाँ ही स्त्रियों से टकराती हैं—
काँच की चूड़ियों-सी खनकती
पर भीतर से चटकती हुई।
फिर उस टूटन का शोर
पुरुष की देह पर मढ़ दिया जाता है,
जैसे वह ही हर विघटन का कारण हो।
जो बेटा कल तक
माँ की साँसों का सहारा था,
विवाह के बाद
वह दीवार क्यों बन जाता है?
संवाद के दीप बुझें
और आरोपों की आँधी चले—
यह कैसी स्वतंत्रता है
जो प्रेम से कटकर
कठोरता बन जाती है?
स्वतंत्रता
यदि उत्तरदायित्व से विहीन हो,
तो वह पंख नहीं,
अव्यवस्थित उड़ान है।
और जब दिशा खो जाए,
तो सत्य थककर बैठ जाता है,
आरोप आगे बढ़ जाते हैं।
यह कविता न किसी के विरुद्ध है,
न किसी के पक्ष में—
यह तो उस पीड़ा की स्वीकारोक्ति है
जहाँ मनुष्य, मनुष्य को
समझने से पहले
आँकने लगता है।
जो स्त्रियाँ
करुणा को शक्ति बनाती हैं,
मर्यादा को बंधन नहीं मानतीं,
और प्रेम को संवाद—
उन्हें मेरा मौन प्रणाम।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
