ढलती शाम
” बाबुजी अब तक नहीं लौटे।”
शिखा कब से बाबुजी की बांट जोह रही थी।
“शेखर, रोज टहल कर समय पर आने वाले बाबूजी कहां रह गये होंगे?”
जब से शेखर की माताजी यानी सासुजी का देहांत हुआ है, बाबूजी बिल्कुल अकेले हो गये है।
कभी कभी किताब पढते-पढते आंखे पोंछने लगते है। कभी बीच में ही खाना छोड़कर चल देते है। गुमसुम से बालकनी में बैठे रहते है। न बच्चों के साथ खेलना, न किसी से मिलना।
” शेखर, बाबूजी को कुछ सामाजिक संस्थाओं से जोड़ दो।”
” नये मित्र बनेंगे ही, सामाजिक कार्य में रूचि होने से उनका मन भी लग जायेगा।”
शिखा ने शेखर से कहा।
अल सुबह बाबुजी सैर पर निकलते है। आते ही अपनी संस्था में चले जाते है। शिखा का थमाया टिफिन बच्चों के साथ बैठकर खाते है। अपनी नई दुनिया में घुल-मिल गये है वे। शिखा शेखर भी निश्चिन्त हुए हैं।
