कविता

वर्तमान का दीप

मैंने वर्तमान की देहरी पर
अपने थके सपने रख दिए,
पल ने चुपचाप
मेरी आँखों से बात की।
भविष्य दूर
धुँध में लिपटा खड़ा रहा,
उसके हाथों में
केवल वचन थे।
उसकी मुस्कान
ओस-सी उजली थी,
पर उसमें
ठहरने की ऊष्मा नहीं।
उसने कहा—आओ,
मैंने सुना—रुको,
क्योंकि वाणी मधुर थी
पर पगचिह्न खोखले।
आज ने
मुझे पीड़ा दी,
पर सत्य के साथ,
और उसी ने
मेरा हाथ थामा।
मैंने वर्तमान का दुख चुना,
भविष्य के झूठे सुख से,
क्योंकि यही जीवन था।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh