कविता

शिशिर

कोहरे की चादर में लिपटा खड़ा शिशिर।
दिवस में ही हुआ आभास जैसे हो तिमिर।
ठंड से कांपती हवा आ रही है झकझोर।
ओस से देखो नहाई हुई आ गई है भोर।
सूरज मद्धम मद्धम बिखेर रहा किरण।
ठंड से व्याकुल है हर जीवन।
उसमें न कोई ऊष्मा है न कोई गर्माहट।
हर तरफ आ रही है शिशिर की आहट।
कैसा कहर बरपा रहा है ये देखो ठंड।
जगत के प्राणी थर थर कांप रहे हैं आह भरा रहा है ठंड।
अब तो रहम करो हे! ऋतु शिशिर।
जाओ बिदा लो अब बहुत हुआ आपका शिविर।

— डॉ. शैल चन्द्रा

*डॉ. शैल चन्द्रा

सम्प्रति प्राचार्य, शासकीय उच्च माध्यमिक शाला, टांगापानी, तहसील-नगरी, छत्तीसगढ़ रावण भाठा, नगरी जिला- धमतरी छत्तीसगढ़ मो नम्बर-9977834645 email- shall.chandra17@gmail.com