बालश्रम
जिन नन्हें हाथों में होनी चाहिए क़िताबें अक्सर,
उन कंधों पर डालते हो बाल मजदूरी का कहर,
गरीब बच्चों को दुकानों घरों में काम पर रखकर,
क्यों भर देते हो मासूम जिंदगी में क्रूरता का जहर ।
तोड़ रही उस बचपन को न जाने कितनी मजबूरियॉं,
तुमने श्रमिक बना छीन ली उस जीवन से खुबियॉं,
जहॉं गूॅंजनी चाहिए हॅंसी विरान वो “आनंद” गलियॉं,
परिवार पैसा पोषण हर तरफ केवल खड़ी चुनौतियॉं ।
मजबूरी का फायदा उठा कमाना चाहते तुम मुनाफा,
ईश ने लिख दिया तुम्हारे नाम दुःखों का लिफाफा,
बालश्रम अपराध ही नहीं बालहत्या कष्ट चौतरफ़ा,
भोले मन की आह से हर सुख हो जाता रफा-दफा ।
जिंदगी न जाने कब करदे अपना इंसाफ पलटवार,
मत करो लोभ में पड़ बाल बचपन पर ये अत्याचार,
जब जीवन इंसानियत को छोड़ करता है व्यापार,
कड़क हो जाता न चाहते हुए भी प्रेममय व्यहवार ।
मुहिम जगा मुस्कान लाओं बालश्रम का हो विरोध,
गरीब बालकों की शिक्षा में सहयोग करें हैं अनुरोध,
उज्जवल भविष्य रहे देश का ताकतवर निर्विरोध,
गरीब बच्चों की शिक्षा स्वास्थ्य पर न आएं अवरोध ।
— मोनिका डागा “आनंद”
