गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कितने हसीन हैं ये संवारे बग़ैर भी,
कुछ लोग आ गऐ हैं पुकारे बग़ैर भी।

इक दूसरे भी रंग को उसने चढ़ा लिया,
ये पहला रंग ख़ुद से उतारे बग़ैर भी।

डोली नहीं कि अर्थी को भी कांधा चाहिए,
कटती नहीं हयात सहारे बग़ैर भी।

उसने जो मुझको देखा तो मैं भी न रह सकी,
दरपन में आज ख़ुद को निहारे बग़ैर भी।

इस पर हैं उसके ख़ून के क़तरे लगे हुए,
ये वर्दी जच रही है सितारे बग़ैर भी।

पैसा तो उसको भेजा है परदेस से मगर,
मुफ़़लिस वो हो गई है तुम्हारे बग़ैर भी।

झीलों में इसका अक्स नज़र आ रहा है अब,
ये चांद नीचे उतरा उतारे बग़ैर भी।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।