कविता – नहीं झांकता सूरज
नहीं झांकता सूरज अब घरों के रोशन दानों से
अब ऐसी ने लिया है रोशनदानों की जगह,
सूरज तरस जाता है घर की खिड़कियों से झांकने को,
पर बंद खिड़की पर लगे होते हैं
मोटे-मोटे परदे,
सूरज घर के दरवाजे से अंदर आना चाहता है
पर दरवाजे बंद रहते हैं अब घरों के,
मनुष्य के हृदय की तरह,
सूरज घरों के आंगन में आकर पसरना चाहता है
पर बड़े -बड़े फ्लैट्स में आँगन नदारद हैं ।
सूरज उदास हताश सा ,
फेरे लगा कर वापस अपने डेरे में लौट जाता है इस आशा के साथ कि
कभी तो उसके लिए फिर खुल जायेंगी खिड़कियां, दरवाजे,
फिर से वह आँगन में बूढ़ी दादी के साथ जी भर बतियायेगा।
फिर से हँसेगा ,धूल खेलते आँगन में अबोध बालक संग।
सूरज कभी निराश नहीं होता।
— डॉ. शैल चन्द्रा
