‘सब कुछ’ पाना है मकसद
खोज़ते हर कोई किसी न किसी तरह की ख़ुशी,
इस बेचैन संसार में मिल जाए सुकून और हँसी।
हममें से अधिकांशजन खोज रहें मन की शांति,
आज ‘युवा तरुणाई’ के मन में बहुत सारी भ्रांति।
हम आखिर क्या ढूंढ रहे हैं क्या चाह रहे हैं पाना,
दौड़ रहे हैं पैकेज के पीछे इसका हैं पता लगाना।
यहाँ इसमें छूट रहा वयोवृद्ध माता-पिता का साथ,
इस उम्र में ही तो पकड़ना है उनका हाथों में हाथ।
सोचता हूँ आंखें बंद कर ‘सब कुछ’ पाना मकसद,
वो करना चाह रहें हो कि दुनिया हो जाए हथप्रभ।
खुशी, सुकून, संतोष एवं मौज-मजा तो हैं परिवार,
न जाओं इन्हें छोड़कर ये तो है जीवन का आधार।
— संजय एम तराणेकर
