आईना दिखाने का अपराध
मेरी खामियों का शहर में ढिंढोरा पीटा गया,
जैसे उनके गुनाहों ने कभी जन्म ही न लिया हो।
मेरे हर सच को साज़िश का नाम दे दिया गया,
और उनके हर झूठ को दस्तूर बना लिया गया हो।
यहाँ आईने टूटते हैं, सवाल ज़िंदा रहते हैं,
हर चेहरा पाक है, बस नीयत गंदी है।
मेरी एक चूक पर फैसला सुना दिया जाता है,
उनकी सौ भूलों पर खामोशी की चादर तनी है।
यह दौर गवाही नहीं, भीड़ का यकीन माँगता है,
सच आज भी अकेला है, झूठ के साथ जमात है।
जो झुककर चला, वही कमजोर ठहराया गया,
और जो कुचल दिया गया, वही यहाँ हालात है।
मैंने तो बस आईना दिखाने की जुर्रत की थी,
इसलिए मेरा नाम ही गुनहगार लिख दिया गया।
सुकरात की तरह मैं भी बस इतना कह सका—
यह मुल्क नहीं बदला,
बस सच बोलना मुश्किल कर दिया गया।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
