कुनकुनी धूप
ये कुनकुनी धूप और प्यारा तुम्हारा साथ
यूँ उम्र की ढलती दहलीज़ पे चाँद हो पास।
जब तक है श्वास है ये वादा और विश्वास
न छूटेगा इक पल तुम्हारा हाथ और आस।
आओ बैठो फुर्सत में बिताएं कुछ और पल
धूप का निर्मल स्पर्श निखरे हम आजकल।
कांपते हाथों से न डरो पकड़ो प्याला चाय का,
एहसास और जाने कब तक मिले संग साए का।
वक्त का क्या भरोसा जी लो ज़िंदादिली से
ये खुशनुमा समां और परिवार की खुशी में।
आओ अब सफ़र की थकान कम कर लें हम
जीवन के मुश्किल पलों को आसान कर लें हम।
— कामनी गुप्ता
