हास्य व्यंग्य

साहित्य की ऐसी तैसी 

भाई भरोसे लाल अपने बच्चों के पास विदेश पहुंच गए ।  जब वे  विदेश पहुंच ही  गए तो वह वहां जाकर अंग्रेज हो गए और जब अंग्रेज बन ही गए तो भारत में जो गुलाम मानसिकता जी जड़ जम चुकी थी , वह अभी मिट थोड़ी थी ।  भारत के लोग भी उन्हें अंग्रेजी ही समझने लगे अब जब अंग्रेज समझने लगे तो उन्होंने भी इस बात का पूरा फायदा उठाया क्योंकि आखिर  तो वे भी तो  भारतीय ही थे बेशक कितने भी अंग्रेज बन जाएं पर उन की भारतीयता जा थोड़ी सकती है । तो यहां जब उनका अपने रिश्तेदारों से संपर्क होता तो यहां के रिश्तेदार उन्हें अपनी साहित्य को उपलब्धियां के बारे में बताते तो उन्हे थोड़ी ईर्ष्या होने लगती वे सोचते विदेश मे तो हम रहते हैं तो गुणगान तो हमारा ज्यादा होना चाहिए पर ये हमारा गुणगान कम कर रहे हैं । तो  उन्होंने सोचा यह तो शायद कोई बहुत बड़ी बात है तो इस बात पर विचार करके उन्होंने भी सोचा है कि कुछ वे  भी हिन्दी मे  लिखना शुरू कर दें । 

 अब क्या था बस कुछ भाई भरोसे लाल जैसे  अंग्रेज  लेखक और साहित्यकार बन गए ।  वे  उल्टी सीधी टूटी फूटी तुकबंदी की  कविताएं आदि लिखने लगे और उन्हें  भारत भेजने लगे । अब क्या था क्योंकि यह तो विदेश के लोगों ने लिखा है  तो  यह तो पता नहीं क्या होगा , वाल्मीकि रामायण तो शायद इसके आगे कुछ भी नहीं है क्योंकि यह तो प्रवासी लेखक का साहित्य है और प्रवासी कोई आम बात थोड़ी होता है । इसलिए उन्होंने उनको अलग स्थान देना शुरू कर दिया और उनके  लेखन को एक नाम दिया ‘प्रवासी लेखन’। इस के बाद तो   बस अब यह  प्रवासी लेखन एक प्रजाति ही बन गई । पर उनकी यानि देशज लोगों को  यह समझ में नहीं आया कि उनका लेखन तो प्रवासी लेखन है तो क्या तुम्हारा लेखन आवासीय लेखन है  तो क्या उनके लेखन को आवासीय लेखन कहा जाए । इस बात का जब मैंने  कई मित्रों से प्रश्न किया तो वे आयें बाएं  की ऊट पटाँग  कहानी  सुनाने लगे और आए बाय करने लगे साथ ही वे   मुझे बेवकूफ घोषित करने पर तुल गए कि मुझे तो साहित्य का कुछ  पता ही नहीं है । क्योंकि मुझे यह कहाँ पता है कि वे  लोग विदेश में रहते हैं वहां डॉलर कमाते हैं और वह हिंदी में लिख रहे यह क्या काम बड़ी बात है । मैंने कहा हां बड़ी बात तो है क्योंकि वह लिख रहे हैं पर मैंने उन के लेखन का विरोध कब किया है । लिखे अच्छी बात है जो जो भी लिख रहे हैं वह साहित्य ही तो लिख रहे हैं ,फिर इसमें प्रवासी आवास निवासी आदि साहित्य कैसे हो गया ,साहित्य तो साहित्य ही है जैसे मनुष्य तो मनुष्य ही है । उसे यदि हम जातियों में या  वर्गों में या गोरे काले पीले नीले आदि में  बाटेंगे तो कैसे काम चलेगा । क्या यह अच्छा लगेगा । हम सब मनुष्यता की बात करते हैं और कहते हैं सारा विश्व एक है  । वासुदेव कुटुबकम  की कल्पना करते हैं और यहां हम लेखन को भी अलग-अलग तरह से बांट रहे हैं । 

किसी का प्रवासी साहित्य तो किसी का आवासी साहित्य और किसी का निवासी साहित्य आदि  की बात है ।  यह चलो कोई बात नहीं पर वह जब साहित्यकार घोषित हो ही गए तो यह क्या काम बड़ी बात थी फिर उनके लिए कुछ चालक लोगों ने एक अलग मंच  बना लिया या प्रवासी साहित्यकारों का संगठन बनाकर उसमें कुछ यहां के पूर्व अधिकारी जिनके बड़े अधिकारियों से संबंध थे वह भी सम्मिलित हो गए और सरकार से कैसे पैसा इसके लिए ऐंठ लिये  जाए । इस पर काम करने लगे । इसके लिए उन्होंने कुछ सम्मेलन  आयोजित करने शुरू कर दिए  और  कुछ ना समझ मंत्रियों को हिन्दी के नाम पर बहका बहका कर खूब पैसा ऐंठ  लिया और हिंदी के नाम पर अपनी एक दुकान खोल ली  और इसी के माध्यम से  यहां से बाहर घूम आते और बाहर वालों पर अहसान दिखा कर उन्हे  यहां घूमने बुला लेते । सरकार जनता के पैसे से बने बजट मे से उन्हे यहाँ आने का किराया देती और होतं मे ठहरने का खर्चा उठती । इसी तरह यहाँ वालों को भी विदेश भेजती और होटल का खर्चा भी उठती और यह सब हिन्दी के नाम पर और प्रवासी लेखन के नाम पर ही होता है । सरकार  आम जनता के पैसे का खूब दुरुपयोग आसानी से कर लेती है  और इस तरह प्रवासी साहित्य फलने फूलने लगा । बताओ  कैसा कैसा अनुसंधान हमारे भारतीय साहित्य में होता है जबकि होना तो यह चाहिए  कि भारतीय साहित्य पर काम होना चाहिए क्योंकि भारत का सारा साहित्य सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर एक जैसा है वह बेशक  उत्तर का हो या दक्षिण का या पूर्व का या पश्चिम का कहीं का भी हो । इसी तरह एक विश्व साहित्य की कल्पना भी की जा सकती है क्योंकि संवेदनाएं मनोभाव , आचार व्यवहार  मानव जाति का थोड़ा-थोड़ा भिन्न होते हुए भी  मानवीय मूल्यों  में एक ही प्रकार का है । इसलिए उसे विश्व साहित्य और भारतीय साहित्य पर काम होना चाहिए ना कि अलग-अलग खांचो में बाँट कर  प्रवासी, आवासी, निवासी आदि साहित्य मानकर उसे अलग-अलग बनाकर ।  यह साहित्य पर कुठाराघात है ।  पर जो लोग इसका लाभ उठा रहे हैं अपनी दुकान चला रहे हैं चलाएं मुझे इससे क्या है । 

— डॉ. वेद व्यथित

*डॉ. वेद व्यथित

ख्यात नाम : डॉ. वेद व्यथित नाम : वेद प्रकाश शर्मा जन्म तिथि : अप्रैल 9,1956 शिक्षा : एम्० ए० (हिंदी ),पी एच ० डी० शोध का विषय "नागार्जुन के साहित्य में राजनीतिक चेतना मेरठ विश्व विद्यालय मेरठ वर्तमान पता : अनुकम्पा -1577 सेक्टर -3 ,फरीदाबाद -121004 फोन नम्बर : 0129-2302834 , 09868842688 ईमेल : dr.vedvyathit@gmail.com Blog : http://sahiytasrajakved.blogspot.com सम्प्रति : अध्यक्ष - भारतीय साहित्यकार संघ (पंजी ) संयोजक - सामाजिक न्याय मंच (पंजी) उपाध्यक्ष - हम कलम साहित्यिक संस्था (पंजी ) शोध सहायक - अंतर्राष्ट्रीय पुनर्जन्म एवं मृत्योपरांत जीवन शोध केंद्र इंदौर ,भारत परामर्श दाता - समवेत सुमन ग्रन्थ माला सलाहकार - हिमालय और हिंदुस्तान विशेष प्रतिनिधि - कल्पान्त सम्पादकीय परामर्श - ब्रह्म चेतना सम्पादकीय सलाहकार - लोक पुकार साप्ताहिक पत्र संस्थापक सदस्य - अखिल भारतीय साहित्य परिषद ,हरियाणा प्रान्त पूर्व सम्पादक - चरू (साहित्यिक पत्र ) पूर्व प्रांतीय सन्गठन मंत्री - अखिल भारतीय साहित्य परिषद परामर्श दाता : www.mohantimes .com (इ पत्रिका ) जापानी हिंदी कवि सम्मेलनों में सहभागिता अनुवाद : जापानी,रुसी ,फ्रेंच , नेपाली तथा पंजाबी भाषा में रचनाओं का अनुवाद हो चुका है प्रकाशन : मधुरिमा (काव्य नाटक ) १९८४ आखिर वह क्या करे (उपन्यास )१९९६ बीत गये वे पल (संस्मरण )२००२ आधुनिक हिंदी साहित्य में नागार्जुन (आलोचना )२००७ भारत में जातीय साम्प्रदायिकता (उपन्यास )२००८ अंतर्मन (काव्य संकलन )२००९ न्याय याचना (खंड काव्य ) 2011 साहित्य पर शोध : 'बीत गए वो पल' संस्मरण में सामाजिक चेतना कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय कुरुक्षेत्र 'आखिर वह क्या करे ' उपन्यास में अन्तर्द्वन्द की अवधारणा विनायक मिशन्स विश्व विद्यालय तमिल नाडू 'भारत में जातीय साम्प्रदायिकता ' उपन्यास में सामाजिक बोध krukshetr विश्व विद्यालय 'मधुरिमा' काव्य नाटक पर शोध कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय नवीन सर्जन : * "व्यक्ति चित्र " नामक नवीं विधा का सर्जन किया है * "त्रि पदी" काव्य की नई विधा का सर्जन किया है अन्य *कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय में आयोजित एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में अंतिम सत्र की अध्यक्षता * शताधिक साहित्यिक समारोह व गोष्ठियों की अध्यक्षता की है अंर्तजाल (Internet) पर प्रकाशित विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशन : www.pravasiduniya.com www.sahityashilpi.com www.p4poetry.com http://sakhikabira.blogspot.com http://aakhrkalsh.blogspot.com http://blog4varta.blogspot.com http://utsahi.blogspot.com www.chrchamnch.com www.janokti.com www.srijangatha.com www.khabarindya.com etc. सम्मान : साहित्य सर्जन के लिए "समाज गौरव "सम्मान भारतीय साहित्यकार संसद द्वारा "मोहन राकेश शिखिर सम्मान पत्रकार विश्व बन्धु सम्मान युवा कार्यक्रम एनम खेल मंत्रालय भारत सरकार द्वारा सम्मान हिमालय और हिंदुस्तान एवार्ड हरियाणा सरकार द्वारा आपात काल के विरुद्ध किये संघर्ष के लिए ताम्र पत्र से सम्मानित विभिन्न विधाओं में निरंतर लेखन....