नियति (भाग्य) से बढ़कर कुछ नहीं
आज हर किसी इन्सान को न जाने किस बात की जल्दी है कि वह प्रत्येक कार्य को चुटकी बजाते ही पूरा करना चाहता है। चाहे गृहकार्य हो, ऑफिस कार्य या कोई सामाजिक कार्य। और तो और अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचने की उसे हमेशा जल्दी रहती है। इसी जल्दबाजी के चलते वह व्यर्थ की भागमभाग करता है। परिणामस्वरूप कई बार उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है।
प्रायः हमें टेलीविजन एवं समाचार-पत्रों के माध्यम से दुनिया भर में घटित हुई दुर्घटनाओं के समाचार देखने व पढ़ने को मिलते हैं। जिसमें जान माल से हुए नुकसान को बताया जाता है। जब ऐसे समाचारों को देखते एवं पढ़ते है तो दिल से एक ही आवाज आती है कि- ‘‘ऐ! ईश्वर ऐसा नहीं होना चाहिए था।’’ दूसरी ओर सोशल मिडिया साईटस पर अपलोड करने के लिए आजकल नौजवान युवक-युवतियों को रीलें बनाने का न जाने कौनसा भूत सवार हुआ है। अपनी रीलें बनाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्हें न तो कानून का भय होता है और न ही अपने जान की परवाह।
प्रकृति ने भी समय-समय पर अपना विकराल एवं क्रूर रूप प्राणीमात्र को दिखाया है। दुनिया भर में कई स्थानों पर भयंकर तूफान, भयंकर भूकम्प, तो कई स्थानों पर अतिवृष्टि से बाढ़ की स्थिति, ज्वालामुखियों का फटना इत्यादि। आजकल कई देशों में मानवीय अहंकार के चलते युद्ध की स्थिति बनी हुई है। एक देश दूसरे देश को नीचा दिखाने के प्रयास में अपनी मानवता तक भूल गया है। अभी हाल ही में अमेरिका जैसे विकसित देश ने भी मात्र अहंकार एवं अपना दबदबा कायम रखने के लिए आसपास के छोटे-छोटे देशों के समक्ष युद्ध की स्थिति पैदा कर दी है।
एक बात यहाँ पर गौर करने की है कि इस प्रकार की परिस्थितियाँ हमारे सामने आती ही क्यों है? इस पर जब चिन्तन किया गया तो निष्कर्ष निकल कर सामने आया कि इन सब घटनाओं एवं प्राकृतिक आपदाओं के पीछे नियति (कर्म सत्ता) का बहुत बड़ा हाथ है। नियति हमसे वही कार्य करवाती है जो हमारे भाग्य में पहले से लिखा होता है। जैसे कि हमारे शास्त्रों में भी लिखा है कि प्रत्येक जन्म लेने वाला प्राणी जन्म के साथ ही अपने कर्म लिखा कर लाता है। धार्मिक ग्रन्थों में भी ऐसे कई उदाहरण पढ़ने को मिलते हैं, जैसे- मर्यादा पुरषोत्तम भगवान श्री राम, जिन्होंने अनेक प्रकार के कष्टों को सहन करते हुए 14 वर्षों का वनवास काटा। धुरन्धर तीरदांज पाण्डव पुत्र वीर अर्जुन को भी कुछ समय के लिए नारी का रूप धारण करना पड़ा। 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को भी असहनीय वेदना सहते हुए अपने कानों में कीले टूकवानी पड़ी…..इत्यादि। इन सभी को ऐसा क्यों करना पड़ा क्यूंकि यह उनके भाग्य (कर्म) में पहले से ही लिखा हुआ था।
अभी हाल में ही मुझें प्रसिद्ध जैनाचार्य श्री विजय अभयशेखर सूरिजी की पुस्तक ‘‘जेलर’’ को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूज्यश्री ने उसमें बताया गया कि किसी भी प्राणी के जीवन में होने वाली होनी अथवा अनहोनी के पीछे निमित्त, स्थान एवं समय निश्चित होता है। जहाँ जिस घटना को होना है, जिस समय होना है तथा जिस स्थान पर होना है यह सब पहले से तय होता है। पूज्य गुरुदेव ने जेलर पुस्तक में अनेकों उदाहरणों के माध्यम से इसे अच्छे से समझाया है।
मित्रों! जैसा कि हम सभी का मानना है कि हमारे कर्मों में पूर्व से जो-जो लिखा होता है वही हमारे साथ घटित होता है। मनुष्य का इसमें कोई दोष नहीं होता। वह तो वही करता है जो नियति उससे करवाती है। हम प्रतिदिन होने वाली घटनाओं, प्राकृतिक आपदाओं एवं युद्ध के समाचारों को देखते-सुनते हैं। इनका घटित होना अथवा ना होना सिर्फ-और-सिर्फ नियति निर्धारित करती है। इसमें किसी का कोई दोष नहीं होता। प्रकृति भी अपना विकराल रूप तभी दिखाती है जब उसके साथ छेड़छाड़ की जाती है।
.. राजीव नेपालिया (माथुर)
