कोट धार की दूर वाली कलोल
वह भी दिन थे जब पिछड़ी हुई थी कोटधार
दूर इतनी थी जैसे जाना हो सात समुंदर पार
घुमारवीं से झंडूता मांडवा होकर जाती थी बस
बादल दिखते ही ड्राइवर उतार देता था बीच मंझधार
सड़क नहीं होती थी पैदल ही होता था सफर
झंडूता मांडवा मलारी या तलाई से आते थे लोग अपने घर
बियाबान जंगल होते थे डरावना होता था सारा रास्ता
अकेले आ जाते थे घर जो पहुंचना लगता नहीं था डर
दूर वाली कलोल के नाम से जानते थे कलोल को
समय बहुत लगता था पहुंचने में क्योंकि थी बहुत दूर
कभी पैदल कभी ट्रक ट्रैक्टर पर कटता था सफर
था पिछड़ा बहुत क्षेत्र लोग थे बहुत मजबूर
सब्जी नहीं मिलती थी अनाज भी नहीं था भरपूर
सड़कें नहीं थी लोग पैदल चलने को थे मजबूर
पढ़ाई करना भी था कठिन क्योंकि स्कूल थे दूर
बहुत साधारण थे कोटधार के लोग नहीं था कोई गरूर
भैंसें बहुत पालते थे करते थे इनका व्यापार
इसीलिए तो नाम पड़ा था कोट की धार
दूध घी बहुत खाते थे होते थे बहुत बलवान
कोटधार के तभी तो बहुत मशहूर थे पहलवान
समय ने करवट बदली टल गई काली छाया
बाघछाल पुल बना सबको फोरलेन पर पहुंचाया
सड़कों का बिछा जाल पुलों की लगी भरमार
कोटधार नहीं रहा पिछड़ा अब तरक्की की राह पर आया
— रवींद्र कुमार शर्मा
