पुरानी इमारतें
आज़ भी
धूप की चुप्पी में
पत्थर साँस लेते हैं
काई की हरी लिपि
समय पढ़ता रहता
टूटी खिड़की से
हवा का पुराना गीत
कदमों की यादें
धूल में अब भी
चुपचाप जलती हैं
शाम की परछाईं
इतिहास का दीपक
गिरता नहीं कभी
मन को थाम लेता
कल का रास्ता दिखाए
— डॉ. अशोक
