होरी की यातना
रोटी के ही वास्ते होरी छोड़ें गांव
तब भी अभाव में धंसे उसके अपने पांव
कैसा रमेश शहर है पूछे ना तुझे कोय
काम उसको मिला नहीं किस्मत पर अब रोय
ये सोचकर शहर गया लेगा कर्ज़ उतार
शोषण के हाथों उसे मिले खूब ही खार
प्रेमचंद आकर स्वयं देखो होरी हाल
मिलती होरी को कहां सुख से रोटी दाल
काम होरी को न मिला हाल हुआ बेहाल
समझ न पाया वो यहां उनकी कोई चाल
परिश्रम जितना वो करें फिर भी मिले न ठौर
बेकारी का आ गये देखो कैसा दौर
रेन बसेरा बन गया उसका अब फुटपाथ
समझे उसे लोग यहां कोई पड़ा अनाथ
होयगी कल सुबह नई कटी आस से रात
मगर सुबह आती नहीं करता पश्चाताप
नारे नवीन ही मिले उसको तो हर रोज
भूख मिटे उसकी कहां इस पर चलती खोज
मिले सपेरे खूब ही लेकर के वे सांप
डसते होरी को सदा देखो जी चुपचाप
— रमेश मनोहरा
