जरूरतें, जिम्मेदारियां और ख्वाहिशें
जरूरतें बोलीं
रोटी पहले चाहिए
सपने बाद में
जिम्मेदारियां
कंधों पर चुपचाप
वक्त का बोझ
ख्वाहिशें हँसीं
आंखों में रंग भर
उड़ना चाहा
थाली में सादा
मन में प्रश्न गहरे
कौन पहले
कर्तव्य की राह
ख्वाहिश ठहर गई
संयम जीता
भूख ने समझाया
जीवन संतुलन
मांगता है
ख्वाहिश झुकी
जिम्मेदारी के आगे
गरिमा बची
संतुलित मन
यहीं से जन्म लेता
सार्थक जीवन
— डॉ. अशोक
