कविता

औचित्य क्या?

यथार्थ को त्याग,
सच्चाई को कुचल,
कल्पनाओं को सच बता
इतराऊं मचल मचल,
सारे संसार का ज्ञान
ठूंस लूं अपने अंदर,
पर यकीन करूं हो जाए
कोई अलौकिक चमत्कार,
तो फिर औचित्य क्या
उस ठूंसे हुए ज्ञान का,
लदे रहूं हीरे मोतियों से,
ढका रहूं नवीन वसनाें से,
और रखूं अस्वच्छ तन को,
तो औचित्य क्या अथाह धन का,
सबको पढ़ाता फिरूं विज्ञान,
बटोरूं नित सम्मान,
जा जा व्याख्यान दूं
विद्यालयों में, महाविद्यालयों में,
और अंधा यकीन करूं
पाखंडों और अन्धविश्वास पर,
तो औचित्य क्या अथाह ज्ञान का,
प्रकृति से प्रेम करूं,
हर जीव की उपयोगिता समझूं,
सिर्फ अपनी सनक खातिर
कैद में रखूं तोता,मैना, बुलबुल,
तो औचित्य क्या खुले आसमान का,
कामना है न बंधूं किसी ऐसे नियम से
जो मुझे इंसान न रहने दे,
और हां जिसे जो कहना है कहने दे।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554