मतलब
मतलब की हँसी, मतलब की यारी,
अजीब हैं बेमतलब के रिश्ते जग में।
अपने-अपने से लगते सब जहाँ में,
फिर भी मुश्किल में सब लापता यहाँ में।
बेशकीमती हर चीज़ जगत की,
सस्ती बिकती बस साँसें इंसान की।
ये मेरा, वो भी हो मेरा—बस सब,
मायावी दुनिया के सब शिकार यहाँ।
पानी होता खून, और महँगा होता पानी,
नज़रें बचते-बचाते अपने ही यहाँ।
सच बोलो तो बनाओ दुश्मन यहाँ,
खामोशी ओढ़े बैठे सब गुनहगार यहाँ।
भीड़ बहुत है इंसानों की राहों में,
पर इंसानियत होती लापता यहाँ ।
— मुनीष भाटिया
