कविता

मतलब

मतलब की हँसी, मतलब की यारी,
अजीब हैं बेमतलब के रिश्ते जग में।

अपने-अपने से लगते सब जहाँ में,
फिर भी मुश्किल में सब लापता यहाँ में।

बेशकीमती हर चीज़ जगत की,
सस्ती बिकती बस साँसें इंसान की।

ये मेरा, वो भी हो मेरा—बस सब,
मायावी दुनिया के सब शिकार यहाँ।

पानी होता खून, और महँगा होता पानी,
नज़रें बचते-बचाते अपने ही यहाँ।

सच बोलो तो बनाओ दुश्मन यहाँ,
खामोशी ओढ़े बैठे सब गुनहगार यहाँ।

भीड़ बहुत है इंसानों की राहों में,
पर इंसानियत होती लापता यहाँ ।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com