कविता – कोख का प्रतिरोध
ग़ज़ा के ध्वंस के बीच
मृत्यु तांडव कर रही थी।
धुएँ और चीख़ों से
आकाश बोझिल था,
धरती श्मशान बन रही थी।
बमों की गर्जना में
घर, अस्पताल, इबादतगाह
मिट्टी हो रहे थे।
हर सुबह
एक नया शव उग आता था।
फिर भी
आतंक और अभाव के बीच
जीवन पनप रहा था।
टूटी गलियों में
कुछ धड़कनें बची थीं।
स्त्रियाँ—
हाथ खाली,
आँचल में भविष्य।
आँखों में भय,
गर्भ में विश्वास।
हर धमाके पर
एक दुनिया
उनके भीतर
डगमगाती थी।
फिर एक दिन
तोपें थमीं।
आकाश रुका।
और गर्भ ने
साँस ली।
आख़िर
जीवन जीता,
मृत्यु हारी।
लाखों स्त्रियों ने
मौन युद्ध लड़ा
और जीत लिया
कोख का युद्ध।
उन्होंने
इतिहास नहीं लिखा,
इतिहास को जन्म दिया।
अजन्मे होंठों से
हवा बोली—
“धन्यवाद माँ,
तुमने हमें
संभावनाओं में पाला।”
वे चलेंगे
अमन की धरती पर,
देखेंगे
भयमुक्त आकाश।
यह सिर्फ़ ग़ज़ा नहीं—
हर युद्धग्रस्त धरती है।
हर युद्ध के बाद स्त्री
जीवन रचती है।
युद्ध मानवता मारता है,
स्त्री मानवता बचाती है।
— उमाकांत भारती
