कहानी

कहानी – फसलें उजाड़ते बाड़

दिसंबर का महीना घोर सर्दियों के दिन।
मैं कमरे में बैठा हीटर सेंक रहा था और टीवी पर समाचार देख रहा था।
टीवी पर एक खबर चल रही थी । मेरा ध्यान उस खबर में डूब गया।
एक ऑटो वाला लड़का अपने जख्म दिखा रहा था और पत्रकार सवाल पूछ रहा था।
लड़का बता रहा था -“पुलिस वालों ने मुझे ऑटो लेकर चलने को कहा, परंतु मैंने अपनी मजबूरी बताते हुए मना कर दिया कि मुझे कोई और सवारी उठानी है वह मेरा इंतजार कर रही है तो पुलिस के लोग मेरे मना करने पर भड़क गए और वहीं दो चार डंडे मारने के बाद मुझे थाने ले गए।
फिर वहां बारी-बारी सबने मुझे पीटा।
पलास से मेरे पैरों के नाखून उखाड़ दिए । “
उसके पैरों पर पट्टियां बंधी थी।
कहते-कहते वह बीस बाईस साल का लड़का रो दिया।
पलास से नाखून उखाड़ने के बारे में सोचकर मेरे मुंह से आह निकल गई । जैसे किसी ने मेरे सीने में छुरा घोंप दिया हो।
क्या ऐसे निर्दयी लोग भी हो सकते हैं ?
जो बेवजह बिना कसूर के भी देश के नागरिक पर इस तरह का जुल्म कर सकते हैं? मेरे मन में खौफ और आक्रोश का लावा उबलने लगा।
यह उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के किसी थाने का केस था।
शुक्र हो मीडिया का जिसने इस घिनौनी व्यवस्था में गरीब के शोषण की तस्वीर को दुनिया के सामने ला दिया था।
उस खबर के बाद टीवी पर दूसरी खबरें चल पड़ीं थीं ।परंतु मेरा मन रह रहकर वहीं अटक गया था।
पिछले हफ्ते घटित हुई इसी तरह की एक और खबर मेरे मानस पटल पर चल रही थी। यह भी आगरा के आसपास की ही थी। वहां भी एक लड़के को पुलिस ने इसी तरह पीटा था ।उसका भी पिटाई से बुरा हाल था। उसे टॉर्चर करने के लिए कई तरह की यातनाएं दी गई थीं ।
उसके शरीर पर भी जगह-जगह जख्मों के निशान थे…।
उसको पुलिस इसलिए उठा कर ले गई थी कि मर्डर का कोई केस था जिसके लिए उसे कहा जा रहा था कि तू स्वीकार कर ले कि मर्डर तूने ही किया है।
शायद किसी दूसरे का जुर्म उसके सिर मढ़ा जा रहा था। जब उसने इस झूठे केस को स्वीकार करने से मना किया तो उसे भी थाने में कई तरह की यातनाएं दी गईं थीं।
मीडिया ने इस प्रकरण को भी देश दुनिया के सामने लाया था।
मीडिया के लोग उससे भी पूछ रहे थे और वह बता रहा था कि-” किसी मर्डर को स्वीकार करने के लिए उस पर दबाव बनाया जा रहा था ।
जब वह नहीं माना तो उसे बहुत बुरी तरह से पीटा गया।
झूठे मर्डर केस को वह कैसे स्वीकार कर लेता ?
जबकि उसने ऐसा किया ही नहीं था।”
वह टांगों पर पट्टियां बांधे कुर्सी पर बैठा था और मीडिया के लोग उससे प्रश्न पूछ रहे थे।
वह अपना सारा दुखड़ा मीडिया को सुना रहा था।
मीडिया ने इस घिनौने कांड को समय रहते उजागर कर दिया और एक गरीब बेकसूर आदमी को जेल की सलाखों में सड़ने से बचा लिया।
ये दोनों खबरें विचलित करने वाली थीं। मैं बैठा बैठा भीतर ही भीतर पिघलने लगा था । मेरे मुंह से निकला -“अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा।”
फिर मन ने कहा -“समरथ को नहीं दोस्त गोसाई ।”
देश की ऐसी स्थिति पर चिंतन करता हुआ मैं सोच रहा था-
“दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की हामी भरने वाले इस लोकतंत्र में आज भी आम आदमी अन्याय की भट्ठी में जल रहा है।
उसकी सुनने वाला आज भी कोई नहीं है?”
ऐसे बहुत से प्रश्न मुझे विचलित कर रहे थे।
इन खबरों को देखने के बाद मैं भीतरी उद्वेलन से जूझता हुआ न जाने कब उस समय में पहुंच गया जब मैं नया-नया दुर्गम क्षेत्र में अध्यापक लगा था।
यह लगभग पैंतीस साल पहले की बात है।
लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे वह सब भी इन्हीं घटनाओं के साथ पिछले कल ही घटित हुआ हो…।
रावी नदी के पार पुल को पार करके लगभग दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर एक छोटा सा गांव था।
दस बारह घरों के इस गांव में लगभग सौ लोग रहते थे उस समय गांव साधन और सुविधाहीन थे।
कोई मजदूरी करता तो किसी ने भेड़ बकरियां पाल रखीं थीं।
इसी गांव में जयनंद का परिवार भी रहता था। छोटा सा कच्चा घर और कुछ भेड़ बकरियां पाल रखी थी उसने ।
उसका एक ही लड़का था भरत कुमार। वह बीए करने के बाद शिमला यूनिवर्सिटी में एम ए कर रहा था ।
लड़का पढ़ने में बहुत होशियार था। इसलिए बापू मेहनत मजदूरी करके भेड़ बकरियां पालकर उसे अच्छी शिक्षा के लिए यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहा था।
न जाने अपनी औलाद से मां-बाप को कितनी आशाएं हुआ करती हैं जयनंद को भी थीं ।
इसलिए वह भयंकर गरीबी से लड़ता हुआ भी अपने बेटे के सुनहरे भविष्य के सपने देख रहा था। उसे क्या पता था कि उसके सपने महज सपने बनकर ही बिखर जाएंगे।
एक दिन हुआ यह कि गांव में कोई छोटा सा फंक्शन था।
इस खुशी के मौके पर थोड़ी बहुत लोगों ने शराब भी पी रखी थी।
इसी बीच गांव में एक व्यक्ति कादूसरे व्यक्ति के साथ झगड़ा हो गया बात मार पिटाई तक पहुंच गई।
फिर दूसरी पार्टी ने थाने में रपट लिखवा दी और पुलिस इंक्वायरी करने के लिए गांव में आ गई… ।
पुलिस के तीन लोग आए थे एक हवलदार और दो कांस्टेबल।
पुलिस की आव भगत में उन्हें भी थोड़ी-थोड़ी पिला दी गई।
शराब पीने के बाद उन्होंने दोनों पार्टियों को बुलाया और राजीनामा करवा दिया। राजीनामे पर साइन करने थे जिसके लिए किसी गवाह की जरूरत थी।
उन्होंने कोरे कागज को लिया और भरत कुमार को कहा – “तुम यहां गवाह के तौर पर अपने हस्ताक्षर कर दो। हम राजीनामा थाने जाकर खुद लिख लेंगे।”
लड़का अड़ गया। बोला-” पहले राजीनामा लिख लो मैं साइन कर दूंगा । परंतु आपके खाली पेपर पर मैं साइन नहीं करूंगा।”
बस बात इतनी सी थी और पुलिस वालों को लगा कि यह कल का लड़का हमें कानून सिखा रहा है ।
नशा तो चढ़ा ही था । एक नशा वर्दी का और दूसरा शराब का।
उन्होंने लड़के को बारी-बारी पीटना शुरू कर दिया ।
फिर उसे पकड़कर गांव से ले आए और बोले -“चल थाने चल देखते हैं। उतारते हैं तेरी पढ़ाई की सारी गर्मी…।”
साथ में दो चार मां बहन की गालियां भी बकीं।
वे उसको पकड़ कर साथ थाने ला रहे थे।
उनकी प्रताड़ना से लड़का घबरा गया था । वह पुलिस की उस प्रताड़ना का सामना नहीं कर सका और जैसे ही पुल पर पहुंचे लड़के ने उनसे छूटकर देखते ही देखते उफनती हुई रावी नदी में छलांग लगा दी…।
लोगों में हाहाकार मच गई । थोड़ी ही देर में सैकड़ों लोग पुल पर इकट्ठा हो गए ।
भीड़ ने पुलिस वालों को घेर लिया।
फिर थाने से और पुलिस आ गई। अपने पुलिस के जवानों को लेकर पुलिस जिला मुख्यालय आ गई। लड़के को ढूंढने का स्थानीय लोगों व पुलिस ने बहुत प्रयास किया परंतु कहीं भी शव नहीं मिला। दरिया के किनारे किनारे दूर तक लोगों ने ढूंढा परंतु असफल रहे।
तीनों पुलिस कर्मचारियों को सरकार ने सस्पेंड कर दिया।
परंतु उस गरीब का होनहार बेटा दरिया में खो गया। कहीं भी उसकी डेड बॉडी नहीं मिली।
तब थक हार कर सब ने उम्मीद छोड़ दी तो दो महीने बाद एक दिन रावी के किनारे एक कंकाल मिला।
उस कंकाल पर कपड़े का थोड़ा सा टुकड़ा पहचान में आ गया और बापू ने उसे पहचान लिया। वह कंकाल उसके लड़के का था ही था।
फिर उसका पोस्टमार्टम हुआ डीएनए टेस्ट हुआ और वही लड़का निकला।
फिर बाद में सुनने में आया कि उन पुलिसकर्मियों को नौकरी से बर्खास्त करके जेल में भेज दिया गया।
जेल में सजा काटकर वे तो घर आ गए होंगे ।
परन्तु वह गरीब बाप का इकलौता बेटा मुड़कर वापस नहीं आया।
कितनी विडंबना है…?
यह नब्बे के दशक की बात है। आज भी उस घटना को याद करके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। आंखों से बरबस आंसू बहाने निकलते हैं।
मैं सोच में डूबा इन तीनों घटनाओं को अपने मानस- पटल पर हूबहू जैसे देख रहा था।
तभी मेरे मुंह से अचानक निकला- “यह कैसा बाड़ है जो खेत को ही खा रहा है।”
पैंतीस वर्षों के इस लंबे अंतराल के बाद भी गरीब के लिए न्याय व्यवस्था उसी ढर्रे पर चल रही है।
समर्थ व्यक्ति के लिए कल भी कोई दोष नहीं था ।आज भी कोई दोष नहीं है । गरीब के अंतहीन शोषण की गाथा कुछ ज्यादा नहीं बदली है ।
कल भी वैसी ही थी ,आज भी वैसी ही है…।
“बाड़ खेत को कल भी खा रहे थे और आज भी खा रहे हैं।”
तभी अचानक बिजली चली गई और अंधेरा हो गया।
हीटर बंद हो गया।
मेरी तंद्रा टूटी और मैं जैसे किसी बुरे सपने से बाहर आ गया था।
— अशोक दर्द

*अशोक दर्द

जन्म –तिथि - 23- 04 – 1966 माता- श्रीमती रोशनी पिता --- श्री भगत राम पत्नी –श्रीमती आशा [गृहिणी ] संतान -- पुत्री डा. शबनम ठाकुर ,पुत्र इंजि. शुभम ठाकुर शिक्षा – शास्त्री , प्रभाकर ,जे बी टी ,एम ए [हिंदी ] बी एड भाषा ज्ञान --- हिंदी ,अंग्रेजी ,संस्कृत व्यवसाय – राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में हिंदी अध्यापक जन्म-स्थान-गावं घट्ट (टप्पर) डा. शेरपुर ,तहसील डलहौज़ी जिला चम्बा (हि.प्र ] लेखन विधाएं –कविता , कहानी , व लघुकथा प्रकाशित कृतियाँ – अंजुरी भर शब्द [कविता संग्रह ] व लगभग बीस राष्ट्रिय काव्य संग्रहों में कविता लेखन | सम्पादन --- मेरे पहाड़ में [कविता संग्रह ] विद्यालय की पत्रिका बुरांस में सम्पादन सहयोग | प्रसारण ----दूरदर्शन शिमला व आकाशवाणी शिमला व धर्मशाला से रचना प्रसारण | सम्मान----- हिमाचल प्रदेश राज्य पत्रकार महासंघ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए पुरस्कृत , हिमाचल प्रदेश सिमौर कला संगम द्वारा लोक साहित्य के लिए आचार्य विशिष्ठ पुरस्कार २०१४ , सामाजिक आक्रोश द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में देशभक्ति लघुकथा को द्वितीय पुरस्कार | इनके आलावा कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित | अन्य ---इरावती साहित्य एवं कला मंच बनीखेत का अध्यक्ष [मंच के द्वारा कई अन्तर्राज्यीय सम्मेलनों का आयोजन | सम्प्रति पता –अशोक ‘दर्द’ प्रवास कुटीर,गावं व डाकघर-बनीखेत तह. डलहौज़ी जि. चम्बा स्थायी पता ----गाँव घट्ट डाकघर बनीखेत जिला चंबा [हिमाचल प्रदेश ] मो .09418248262 , ई मेल --- ashokdard23@gmail.com