कविता

हनुमंत लाल

धर्म आड़ जो पाप हैं करते।
जहर बीज का बोते रहते।।
कब उनका उपचार करोगे।
पापमुक्त कब धरा करोगे।।

सुनहु बात अंजनि के लाला।
मुख उनका अब करिए काला।।
आप नहीं अब देर लगाओ।
पापी सारे मार भगाओ।।

हनुमत की मिलकर जय बोलो।
केवल मीठा-मीठा बोलो।।
राम भक्त बजरंगी प्यारे।
हर मुश्किल से सदा उबारे।।

सीता जी की खोज किया था।
तांडव लंका दहन किया था।।
संजीवनी शैल थे लाये।
लक्ष्मण मुर्छा मुक्त कराए।।

प्रभु राम के सबसे प्यारे।
सीता माँ के बड़े दुलारे।।
बोले भाले हनुमत लाला।
धाम अवध में डेरा डाला।।

उनको जो भी शीश झुकाता।
रोग शोक उसका भी जाता।।
सेवक बन जो जोड़े नाता।
कृपा राम जी की वो पाता।।

प्रभु भक्त की लज्जा रखिए।
रोग शोक संकट सब हरिए।।
आप चरण हम शीश झुकाएं।
कृपा करो नहिं कष्ट उठाएं।।


चौपाई- शनिदेव


शनीदेव जी किरपा कीजै।
भक्तों के सब दुख हर लीजै।।
भक्त आपके डरे हुए हैं।
रोग शोक से घिरे हुए हैं।

*सुधीर श्रीवास्तव

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